शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

'आज ही हमने बदले हैं कपडे'

             
कहा  जाता  है कि 'धारितो  धर्म:' जो  धारण किया जाये  वो  धर्म है.' मतलब कि धर्म धारण किया जाता है. अब अगर धर्म धारण किया जाता है तो वह उतारा भी जा सकता है. वैसे ही जैसे कपडे धारण किये जाते हैं और फिर उतार देते हैं .इसमें समस्या क्या है ? धर्म कपड़ों से ज्यादा कुछ नहीं है .अब कुछ लोगों ने अपने पहने हुए कपडे उतार कर दूसरे पहन लिए तो इसमें किसी को परेशान होने की क्या जरुरत है ? क्या ये किसी के परेशान होने की बात है कि उन्होंने पुराने कपडे क्यों पहने ? अब उन्हें अच्छे लगे या उन्हें पहनने में उन्हें कुछ लाभ दिखाई दिया तो उन्होंने पहन लिए. सर्दी का मौसम आता है तो हम अपना बीसों साल पुराना कोट निकाल कर पहन लेते हैं . इसमें किसी अन्य को परेशान होने की जरुरत नहीं है . जैसे आज  पहने हैं कल जब  जरुरत नहीं रहेगी  होगी उसे उतार देंगें .
   हाँ ये बात जरूर है कि कुछ कपडे ऐसे होते हैं जिन्हें सार्वजनिक रूप से पहनना किसी समाज में अच्छा नहीं माना जाता है .लेकिन ये भी तो तय  नहीं है कि जिसे पहनना  अच्छा माना जा रहा हो वह समयानुकूल  हो?  कुछ लोग ऊपर से नीचे तक कपड़ों में ऐसे पैक रहते हैं कि ये पता ही नहीं चलता कि कोई इंसान है या चलता फिरता तम्बू और कुछ लोग इतने कम कपड़ों में होते हैं कि आँखें फाड़ कर उनके शरीर पर कपडे खोजे जाते हैं
    वैसे देखा जाये तो कपडे ही हैं जो हमें जानवरों से अलग दर्शाते हैं. सलीके से कपडे पहनना सभ्यता की पहचान है .सही मायनों में दर्जी,नाई और मोची ही जानवर को आदमी बनाते हैं. अगर वो अपना हुनर न दिखाएँ तो आदमी जंगली जानवर जैसा दिखाई देगा. ये आदमी को सजा कर सवाँरकर  उसे सुन्दर, सहज ही नहीं बनाते बल्कि उसे मौसम की मार से भी बचाते हैं. कपड़ों का यही मुख्य काम है कि वो आदमी को  मौसम के अनुकूल रहने  में सहायता करते  हैं .
 कुछ लोग अगर धर्म बदल रहे हैं तो उसे मौसम के अनुकूल रहने की उनकी कौशिश के रूप में देखा जाना चाहिए. पहले भी लोग मौसम को देखकर धर्म बदलते रहे हैं जिसे धर्म परिवर्तन कहा जाता है. जब मौसम ज्यादा प्रतिकूल हुआ तो लोग ज्यादा कपडे बदलकर उसके अनुकूल हो गए . ये अलग बात है कि धर्म आदमी को अंदर से भी बदलता  है लेकिन कितना बदल पाता है यह शोध का विषय है . हर धर्म आदमी को सहिष्णुता, परोपकार, भ्रातत्व सिखाता  है लेकिन फिर भी आदमी जानवर से भी बदतर काम करता है . इसलिए ये कहना  कि धर्म आदमी को पूरी तरह बदल देता  है कुछ सही प्रतीत नहीं होता है .
    कपड़ों से धर्म की तुलना पर हैरान न हों .कपडे भी आदमी को अंदर से बदलते हैं .अगर आप गर्म कपडे पहने हैं तो आपको गर्मी का एहसास होगा ही और अगर मौसम सर्द है तो आप खुश और सुरक्षित रहेंगे .यूँ कपडे कम हों तो भी गर्मी का एहसास हो सकता है लेकिन तब ये देखना पड़ता है कि कपडे है ही नहीं या भावनाओं के गर्म होने के कारण नहीं पहने गए हैं .कुछ भी हो कपडे आदमी को अंदर और बाहर से उतना ही प्रभावित करते हैं जितना धर्म करता है . आदमी रोज नहाता है और रोज कपडे बदल लेता है .उसे ये भी याद नहीं रहता है कि दो दिन पहले उसने कौन से कपडे पहने थे. लेकिन धर्म बदलने से हाय तौबा मचने क्यों लगती है ?  मानव सभ्यता के इतिहास में ये दो दिन दो सौ या दो  हजार साल हो सकते हैं जब उसे धर्म बदलने की जरुरत पड़ सकती है .इसलिए जब ये बदलाव होता है तो बाकी लोगों को उसके साथ एडजस्ट होने में थोड़ी असहजता होती  है. कुछ समय बाद सब पहले जैसा हो जाता है. यूँ उसका बदलना कुछ ऐसा जरूरी भी नहीं है. लोग हजारों साल से अपने पुरखों का धर्म ओढ़े हैं उन्होंने उसे उन्होंने नहीं बदला है. ये अलग बात है कि स्वयं धर्म ही बदल गया है .आज का हिन्दू धर्म और आर्यों का सनातन हिन्दू धर्म एक सा नहीं है . ये बिलकुल उस नाई के उस्तरे की तरह है जिसका कई बार फल और कई बार हत्था बदल गया है लेकिन उस्तरा वही है . या दूसरे शब्दों में कहे कई बार पाजामा बदला है और कई बार कुरता बदला गया  है लेकिन फिर भी पहनते कुरता पाजामा ही हैं . अब कुर्ते पाजामें के रंग तो अनेक हो सकते हैं, सौ हैं . लेकिन लोगों को आपत्ति है कि साहब कुर्ते रोज क्यों बदलते हैं ? भाई आप कब से रूढ़िवादी हो गए? आप तो प्रगतिशील हैं इसलिए वक्त के साथ बदलिये .अब बदलेगें  नहीं तो विकास कैसे होगा ? इसलिए सबसे पहले धर्म को बदलिये. जो लोग बदल रहे हैं उनका विकास जरूर होगा . एक राशनकार्ड तो हाथों हाथ दिया जा रहा है. विकास होने के लिए और क्या सबूत चाहिए ?
  

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