शुक्रवार, 27 मार्च 2015

आम आदमी के दो सच्चे पहरुवे


आम   आदमी   पार्टी  पर घटिया   मानसिकता के नौसिखिया नेता  हावी  हो गए  हैं . उन लोगों ने योगेन्द्र यादव   और   प्रशांत  भूषण  को  पार्टी  से निकलवाने की पूरी   तैयारी   की हुई   है . लेकिन योगेन्द्र यादव  जिस तरह से मीडिया में  अपना पक्ष रख रहें हैं उससे उनकी अच्छी छवि नहीं  बन रही  है उनकी एक तरह से बेचारगी   ही  झलकती  है. ऐसा लगता  है जैसे   वे  अपना पक्ष नहीं रख रहे  जबरन  जिबह  किये  जाने वाले बकरे  से मिमिया  रहे  हैं .कायर  लोग   बकरे   की मिमियाहट  से   नहीं शेर  की दहाड़  से कांपते  हैं .माना  कि  आपने  केजरीवाल  को  आम  आदमी  पार्टी   के संयोजक   पद   से हटाने  की मांग  नहीं की है लेकिन अब  जब  आप  पर  ये  आरोप  मढ़  ही दिया  गया  है तो  आप  खुलकर  कहिये  कि पार्टी  तय  करे  कि एक पार्टी  एक पद  के बारे  में  उसकी  नीति  क्या  है और  ये  बताये  कि केजरीवाल  को  राष्ट्रीय  संयोजक  के पद  पर  होते  हुए  दिल्ल्ली  का मुख्य  मंत्री  होना  क्यों  जरुरी  है.और अगर जरुरी है तो राष्ट्रीय संयोजक पद किसी अन्य को देने में क्या बुराई है ?
 वस्तुस्थिति  ये  है कि योगेन्द्र यादव  जमीनी  नेता नहीं हैं वे  एक बुद्धिजीवी मात्र  हैं जबकि  अरविंद  केजरीवाल  ने अपनी  जमीनी  पकड़  मजबूत  कर  ली  है .आम आदमी पार्ट्री के अधिकाँश छोटे बड़े नेता ये बात जानते और मानते हैं इसलिए वे केजरीवाल  को आगे करके अपने स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं.
 पिछले  चुनाव  तक  चौतरफा  हमलों  के बावजूद  अरविंद केजरीवाल ने  अपनी  आक्रमकता  और   सहजता  बनाये  रखी  जो विरोधी  पक्ष के भारी  भरकम  कद  के बावजूद  उन्हें  जरा  भी  विचलित  नहीं कर  सकी  .मुझे  उनका  यही आत्मविश्वाश  सबसे  ज्यादा  पसंद आया  .ऐसा आत्मविश्वाश  केवल  पक्के  संघियों  में  ही पाया  जाता  है .वे  लगातार  बिना  शरमाये  झूठ  बोल  सकते  हैं .केजरीवाल  ने झूठ  भी  नहीं बोला  और  पूरे  आत्मविश्वाश  से विरोधियों  के सामने  डटे  भी  रहे  .अब  आम आदमी  के दो  सच्चे   पहरुवे  षडयंत्रकारियों  के कारण   आपस  में  उलझ गए  हैं जिसका  सुलझाव  मुश्किल  दिखाई  देता  है केवल  टूट  और  अलगाव  ही इनकी  नियति  है .इस  टूट  और  अलगाव  से  आम  आदमी  पार्टी  का ही नहीं वरन भारत  के आम  आदमी  और  भारतीय  राजनीति  दोनों  का भारी  नुकसान  होगा. लेकिन जनता  के पास  टुकुर  टुकुर  देखते  रहने  के अलावा  अभी  कोई  और  विकल्प  नहीं है . लगता है भारत कि राजनीति के सबसे बुरे दिन आना अभी बाकी हैं .  

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