बुधवार, 1 अप्रैल 2015

मार्क्सवादी हो गये


हादसे में ऐसे दो चार इक्तसादी हो गये 
अब कोई मोसम हो हर मौसम के आदि हो गये, 
मस्जिदें किसने गिरायी कौन मूरत ले गया? 
हम इसी उलझन में आकर मार्क्सवादी हो गये।

.......... मुनव्वर राना


कभी धान को कभी गेहूं को, तेरी मंडियों ने दगा दिया
मेरी खेत से तुझे बैर है, तेरी नीतियों ने बता दिया
मैं किसान हूँ, मेरा हाल ये, मैं तो आसमां की दया पे हूँ
कभी मौसमों ने हंसा दिया, कभी मौसमों ने रुला दिया
ये कहानियां, ये लफ्फाजियां, तेरे मुंह से मुझको जची नहीं
मेरे गाँव में ये रिवाज है, कहा जो भी करके दिखा दिया 
                                                           - बल्ली सिंह चीमा

बारिश का कहर है जो फसल हो गयी चौपट 
मौसम की मेहरबानी पे लाला लपेटता. 
अफसोस आज बाल में दाने नहीं रहे
होते जो सौ सौ दाने तो कैसे समेटता ?


बी जे पी की बात को पी डी पी से माप 

जी डी पी की ग्रोथ को तब समझोगे आप .





अपना अपना चले एजेंडा पर सरकार इकट्ठी हो 

मीठी मीठी ही बतलाना बातें चाहें खट्ठी हों .






अगर स्नेह सम्बन्धों पर पहरे न होते, 

जख्म किसी के तन मन के गहरे न होते. 

जो थोडा सा भी ऑंखों को वो पढ लेते, 

हाथ देह पर बिल्कुल भी ठहरे न होते.





अदालत कातिलों को गर बरी करती है तो कर दे 

मगर इन्साफ कुछ मकतूल के हक़ में भी तो कर दे 

गुनाहगारों को माना वो सजायें  दे नहीं सकती 

तो फिर जो बेवजह मारे गए जिन्दा उन्हें कर दे . 

                               -------अमरनाथ मधुर







मरे जो लोग उनका कोई तो कातिल रहा होगा ?

बड़ा ही बेरहम होगा, बड़ा संगदिल रहा होगा 

जिसे साबित था ये करना अगर वो कर नहीं पाया 

बड़ा शातिर रहा होगा, बड़ा बातिल रहा होगा.

                               -------अमरनाथ मधुर



अहंकार जब सब सीमायें तोड़ गया                                                     आमआदमी मफलर, टोपी छोड़ गया 
आप हमारे बाप नहीं हो सकते हैं 

इतना बोला और अपना मुँह मोड़ गया .

                                     -------अमरनाथ मधुर



करो आरती या दो गालियाँ
क्या फर्क पड़ेगा मिजाज पर
मैंने जो किया वो मिला मुझे 
ये लिखा है मेरे आज पर .   -------अमरनाथ मधुर

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