शनिवार, 18 अप्रैल 2015


इश्क ने मुझको मुकम्मल कर दिया
अब कमी कोई नहीं मुझमें रही 
नेक बन्दा और मिलने से रहा
तू जो चाहे भेज दे मुझपे बही.
           ------- अमरनाथ 'मधुर



पहले चोरी की और अब सीना जोरी
रत्नों की पहचान करेगा ये जौहरी
अपने पत्थर को हीरा बतलाता है
छोडो इससे कौन करेगा मुँहजोरी .
         ------- अमरनाथ 'मधुर



मरकर भी मिल रही मुझे ठडंक दरख्त की
ताउम्र वो जलेगा जो जलता हवश में है
                       - अमरनाथ मधुर


जब सियासत हो चुकी तीखे बयानों की 
फिर कहा जो भी कहा उसका कोई मतलब नहीं 
                     - अमरनाथ मधुर



कुदरत का कहर है जो फसल हो गयी चौपट 
मौसम की मेहरबानी पे लाला लपेटता. 
गेहूॅं की बाल में न बचा एक भी दाना
होते जो सौ सौ दाने तो कैसे समेटता ?
                ---- अमरनाथ मधुर



अभी तू आसमाँ पे है तेरा बिगड़ेगा भी तो क्या
यहाँ धरती पे रह कर देख जीना है बहुत मुश्किल .





घर मेरा जलजले ने जमींदोज क्या किया
जाने कहाँ कहाँ के लोग झाँक रहे हैं .
बेपरदा क्या हुई है मेरे घर की आबरू
कुछ लोग तिजारत के लिए आँक रहे हैं .

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