गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

हाशिये के लोग

    मेरठ में नगर निगम के कर्मचारियों ने अपनी मॉंगों को पूरा करने के लिये दबाव बनाने के लिये काम बन्द हडताल की हुई है। जिसके कारण शहर की सफाई व्यवस्था चौपट है जगह जगह कूडे के ढेर पडे हैं।यही नहीं इन सफाई कर्मचारियों ने शहर की सडकों पर जगह जगह कूडा फैला दिया है, मरे हुये छोटे जानवर फेंक दिये हैं। तमाम शहरी परेशान हैं, अधिकारी परेशान हैं। एक जनहित याचिका की सुनवाई कर कोर्ट ने नगर निगम के अधिकारियों को सफाई की वैकल्पिक व्यवस्था कर तुरन्त सफाई कराने के निर्देश दिये हैं।
. सम्बन्धित अधिकारी परेशान हैं। सफाई कर्मचारियों के सहयोग के बिना वे सफाई कराने में स्वयं को बेबस अनुभव कर रहे हैं|  जिलाधकारी महोदय ने जिला पंचायत राज अधिकारी को ग्राम पंचायतों में कार्यरत सफाई कर्मचारियों को शहर में सफाई करने के लिये भेजने के निर्देश दिये हैं। ज्यादा सभांवना ये हैं कि इससे शहर में सफाई तो नहीं होगी लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की सफाई अवश्य बन्द हो जायेगी। ग्रामीण क्षेत्र के सफाई कर्मी शहर में डयूटी बताकर ग्राम से गायब रहेंगें और शहर में वे किसी की निगरानी में आने वाले नहीं हैं। वैसे भी ग्राम पंचायतों के सफाई कर्मी सर्वजाति से हैं जो पहले से ही बहुत कम सफाई कार्य करते हैं।
                                  

. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सफाई कर्मचारी समाज के सबसे निचले तबके वाल्मिकी जाति से आते हैं जो सदियों से शोषण और दमन सह रहे हैं। आज भी उनका जीवन और कार्य स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। उन्हें भी मानवोचित जीवन जीने का हक है और पूर्ण मानवीय गरिमा प्रदान करने के लिये उन्हें बहुत सारी सुविधायें दिया जाना जरूरी है। इसलिये ये तो तय है कि उनकी मॉंगें बहुत हद तक जायज ही होंगी। उनकी मुख्य मॉंग ठेका कर्मचारियों को नियमित किये जाने की है। इस मॉंग में कुछ अनुचित नहीं है। यही कारण है कि सफाई कर्मचारियों द्वारा शहर में गन्दगी फैलाये जाने के बावजूद किसी भी सामाजिक राजनीतिक संगठन ने उनके इस असामाजिक कार्य के विरूद्ध आवाज नहीं उठायी है। वैसे भी सब जानते हैं कि जब ये सफाई कर्मी विरोध पर डट जाते हैं तो फिर इनका कोई कुछ नहीं कर सकता है चाहे सरकार हो, प्रशासन हो या कोर्ट हो। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि इन्हें सारे समाज को बन्धक बनाकर उसका जीवन नारकीय बनाने की अनुमति दे दी जाये और सारे लोग मूक बने देखते रहें। आखिर जो गन्दगी ये फैला  रहे हैं उससे जो बीमारियॉं फैलेगी वे ये नहीं देखेंगी कि सफाई कर्मी को छोड दें और बाकि लोगों को बीमार करें। बीमारी किसी को भी हो सकती है। गर्मी के मौसम में वैसे ही बहुत सारी बीमारियॉ दूषित जल और खाद्य पदार्थों से फैलती हैं ।इसलिये इस मौसम में तो वैसे ही सफाई की बहुत एहतियात रखनी होती है| ऐसे में सफाई कर्मचारियों द्वारा अपनी मॉंगों को पूरा करने का दबाव बनाने के लिये शहर में गन्दगी फैलाना समाज के प्रति कितना बडा अपराध है इसे सहज ही समझा जा सकता है।
                       
               दिक्कत ये है कि जैसे ही आप ये बात कहते हैं अपने को गरीब समर्थक कहने वाले तमाम लौग और संगठन आपके उपर लटठ तानकर खडे हो जाते हैं। आप या तो उनके शाश्वत तर्कों को मानकर सफाई कर्मियों के विरूद्ध बोलने से चुप हो जायें और उन्हें अपनी मनमर्जी करने दें या फिर अपमानित होने के लिये तैयार रहें। कम्युनिष्टों, समाजवादियों के लिये वे शोषित पीडित वर्ग हैं और हिन्दुत्ववादी संगठनों के लिये वे हिन्दुत्व के कटटर लडाकू योद्धा । समाज में ये दो तरह की विचारधारा वाले लोग हैं जो समाज को हॉंकते हैं। इनमें से कोई भी नहीं चाहता है कि सफाई कर्मचारियों से सफाई के लिये कहकर उन्हें अपने विरूद्ध करे। लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि उनकी यही वैचारिक जडता उन्हें समाज में अप्रासंगिक बना देती है। यहीं आकर गॉंधी प्रसंगिक हो जाते हैं जिन्हें गरियाने धकियाने में सब एक दूसरे से आगे रहते हैं।

                           
.      आज अगर गॉंधी होते तो यूॅं मूक दर्शक बनकर ना देखते रहते। वे स्वयं झाडू टोकरा उठाकर सफाई करने निकल पडते। वे चलते तो उनके पीछे पूरा समाज चलता और जो गन्दगी  सबकी नाक में दम किये है मिनटों में साफ हो जाती। आखिर सफाई करना कोई सफाई कर्मचारियों का ही काम थोडा है ? ये हमसे सब की  जिम्मेदारी है कि हम अपने आसपास सफाई रखें। आखिर हम अपना घर भी तो रोज साफ करते हैं, स्वयं भी तो रोज नहाते हैं क्या कोई ओर हमें नहाने आता है ? अगर हम अपना काम स्वयं करते हैं तो समाज का काम भी हमें मिलजुलकर स्वयं करना चाहिये। आपद धर्म है सबको मिलकर काम करना चाहिये। वे सामाजिक, धार्मिक संगठन, जो  कभी संत्संग,कभी कीर्तन, कभी भण्डारा, कभी देवी मॉं का जागरण, कभी कॉंवड यात्रा तमाम के आयोजन में लगे रहते हैं, पूरी मेहनत से समाज की नींद हराम करते हैं थोडा इस सामाजिक काम में भी तो सहभागी बनें। एन0सी0सी0, एन0एस0एस, स्काउट, नागरिक सुरक्षा दल आदि शासकीय अर्द्धशासकीय संगठन अपने लाव लश्कर के साथ आगे आयें और समाज सेवा का वास्तविक कार्य करें। लेकिन नहीं यहॉं काम कोई नहीं करेगा काम का दिखावा किया जायेगा। पी.एम0 मोदी झाडू लेकर सफाई करें तो उनके मंतरी संतरी सफाई का एकाध नाटक कर लेंगें बाकि फिर जा के सो जायेंगें। मोदी के स्वच्छता अभियान से एक उम्मीद जगी थी कि एक ऐसे आदमी ने ऐसा काम करने को कहा है जिसकी उससे कतई उम्मीद नहीं थी। लेकिन उसकी बातें तो वैसी ही रहीं जैसी के लिये वह मशहूर है। अब कौन यह काम करेगा ? आम आदमी की आवाज उठाने वाले तो दिल्ली की गददी पर बैठते ही ऐसे अन्धें बहरे हो गये हैं कि उन्हें अपने से बीस गज की दूरी पर आत्महत्या करने वाला भी नजर नहीं आता है उन्हें मेरठ की सडकों पर पडा कूडा क्या दिखायी देगा? वो कह सकते हैं कि हम तो दिल्ली में बैठे हैं हम मेरठ में क्या कर सकते हैं ? हॉं आप कुछ नहीं कर सकते हैं ? पागल तो वो आम आदमी है जो आपसे आम आदमी का दर्द सुनने की उम्मीद लेकर राजस्थान से दिल्ली चला आया और आपको अपनी बात सुनाने के लिये पेड पर चढ कर चिल्लाता रहा लेकिन आपने उसकी एक ना सुनी। आप से दिल्ली ही नहीं पूरे देश के आम आदमी को बडी उम्मीद थी कि आप उसके हक में कुछ ऐसा करेंगें जो बाकि दल नहीं कर रहे हैं लेकिन आपने क्या किया ? आपने उसके हक में कुछ नहीं किया। जब आप के कुछ लोगों ने आपसे कहा कि आप को आम आदमी के लिये कुछ करना चाहिये तो आपने झाडू उठयी ओर उन्हें सकेर कर बहार कर दिया। अब आपके लिये झाडू गन्दगी साफ करने का औजार नहीं है वह जनता का उत्पीडन करने का नया हथियार बन गया है और जब ऐसा होने लगेगा तो फिर आम आदमी के साथी नहीं एक गिरोह के हिमायती बन जाते हैं जो जन धन की मनमर्जी से लूट चाहता है।
   मेरा मतलब यह नहीं है कि सफाई कर्मचारियों को नियमित ना किया जाये या उनका वेतन ना बढाया जाये. उनका वेतन अवश्य बढाया जाये चाहे सारे बडे वेतन वालों का वेतन कम ही क्यूॅं ना करना पडे. लेकिन उन्हें भी समाज का ध्यान रखना चाहिये। उन्हें ये भी देखना चाहिये कि कूडा बीनने वाले घरों से 20-30 रूपये महीना लेकर कूडा उठाते हैं उसे छॉंटते हैं और उसमें बहुत सा बेचकर अपना पेट भरते हैं। उन्हें सरकार वेतन नहीं देती है । उनके लिये कोई यूनियन आवाज नहीं उठाती है। उनके लिये कोई राजनितिक दल प्रदर्शन नहीं करता है । उनके लिये कोई धार्मिक सॉंस्कृतिक संगठन अपना घर वापसी का अभियान नहीं चलाता है। वे जो समाज के स्वयंसेवी सफाईकर्मी हैं, वे जो कूडे को उपयोगी कच्चे माल लायक बनाते हैं, वे जो पर्यावरण संरक्षण के प्रचारक नहीं, रक्षक हैं वे जो समाज के सच्चे सपूत हैं जिन पर पुलिस आये दिन डण्डें बरसाती है, गुण्डें हप्ता वसूलते हैं, संगठित गिरोह बेगार कराते हैं, ड्रग माफिया अपना माल ढुलवाते  बनाते हैं, रैली के लिये भाडे पर भीड जुटाने वालों  के काम आते हैं वे जो समाज के अन्तिम छोर पर खडे हैं, सरकार की कोई योजना कोई सहायता उन तक नहीं पहुॅंचती है। जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये के लिये उन्हें समाज के बाकि जबके से कई गुना कीमत चुकाना पडती है । वे समाज के असली शोषित लोग है। झण्डा डण्डा धारी गुण्डें कितना ही चीखें चिल्लायें वे शोषित वर्ग की आवाज नहीं बन सकते हैं वे वेतन बढोत्तरी की लडाई लडते हुये ही मिट जायेंगे उनके चीखने चिल्लाने से इन्कलाब आने वाला नहीं है, इन्कलाब वही लोग लायेगें जो समाज के अन्तिम छोर पर खडे हैं जिनकी आवाज किसी सरकार के किसी दल के नेता के कानों तक नहीं पहुॅंच रही है।

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