शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मक्का में भगदड़


      मक्का में भगदड़ से सैकड़ों लोगों की जान चली गयी है .हर बार की तरह यह हादसा भी शैतान को पत्थर मारने की रस्म के दौरान हुआ है .ऐसा विश्वाश किया जाता है कि दोपहर दो बजे नमाज के बाद शैतान को पत्थर मारना चाहिए .बस इसी विश्वाश को लेकर पत्थर मारने की होड़ बल्कि यूँ कहिये की दौड़ शुरू होती है जिसमें अनेक लोग कुचल कर मर जाते हैं.
पता नहीं शैतान ने कब गुनाह किया होगा जो अभी तक उस पर पत्थर बरसाए जा रहें हैं .हमारी देखी तो अब वो कोई गुनाह करता नहीं है. गुनाह करने वाले तो उन लोगों में शामिल हैं जो उसे पत्थर मार रहें हैं .पहले कभी शैतान ने कोई गुनाह किया भी होगा यद्यपि इसमें भी संदेह है कि उसने वाकई में ही गुनाह किया था लेकिन मान लिया कि उसने गुनाह किया था तो अब तक उसे याद करके पत्थर बरसाते रहना क्या कोई अक्लमंदी का काम है ? ये तो हद दर्जे का पागलपन है. इतने दिन में तो गुनाह करने वाले को भी ठीक से याद नहीं रहता है कि उसने क्या गुनाह किया था और आप हैं कि उसके गुनाहों बहीखाता लिए बैठे हैं . क्या आपआज उसके अपराध को साबित कर सकते हैं ? नहीं कर सकते हैं .सारे साक्ष्य सारे साक्षी मर खप गए हैं. सबूतों के अभाव में किसी को सजा नहीं दी जा सकती है .और आप सजा देने वाले कौन होते हैं ? सजा देने का काम तो किसी और का है .क्या आप को उसके इन्साफ में यकीन नहीं है जो खुद पत्थर मार मार कर सजा दे रहे हैं .अब ये पत्थर शैतान पर नहीं आपकी अक्ल पर पड़े हैं .जरा अपनी सोच के कैद खाने से बाहर आओ .नयी सोच का सूरज अपनी रौशनी लेकर तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. अपनी अक्ल पर पड़े पत्थर हटाओ तो रौशनी अंदर आये .
      वैसे भी ये कितनी अजीब बात है कि इबादत करके उठे और पथराव शुरू कर दिया .इबादत के बाद तो मन शांत और पवित्र होता है .मन करुणा और दया से भरा होता है, परोपकार करने को मन करता है लेकिन पथराव ? इसमें करुणा, दया , परोपकार के लिए कहाँ स्थान है? ये तो शाश्वत घृणा का विस्तार है ,खानदानी दुश्मनी का फैलाव है,तर्कहीन हिंसा है ये कोई धार्मिक कृत्य नहीं हो सकता है .और अगर है तो इसे त्याग देना चाहिए . वरना नास्तिक अगर धर्म को अफीम बताते हैं तो कुछ गलत नहीं कहते हैं .आप के कारनामें उनकी बात के सही होने कि तस्दीक करते हैं .


कुछ दोहे भी पढ़ें 

बकरा,भैंसा खाय के कुछ नर ख़ुशी मनाय 
कुछ मानव का लहू पियें दया धरम समझाय .
----- 'मधुर'


हम कबीर की राह पर चलें औ जूता खाएं 
आप हमारे संग चलो इतना बूता नाय .
------ मधुर


बकरें थे मारे गए जिनको ख़ुशी दिलाय 
या रब ऐसा कीजिये उनको मौत न आय .
                            ------ मधुर  
जन्नत में दोनों मिले हाजी और कसाई 
मिलते ही पूछन लगे बकरा किधर है भाई .

                                ------ मधुर  

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