सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

साहित्यकारों की अवार्ड वापसी




   
रात  ए बी पी न्यूज  चैनल पर साहित्यकारों और  संघी  सूरमाओं    की बहस  देखी  सुनी . कसम  से  मजा  आ   गया  .बहस  ऐसी  थी  जैसे  सरकारी  हैंड  पम्प  पर पानी  भरने  को  लेकर  पानी  भरने  वाले/  वालियां  बहसते  हैं . जैसे पानी का पात्र आगे पीछे करने को लेकर शुरू हुई बहस पड़ोसन के वैध /अवैध संबंधों के अनावरण तक पहुँचती है वैसे ही सबिंत पात्रा और राकेश सिन्हा साहित्यकारों के चरित्रहरण में पूरी बेशर्मी से जुटे थे. पूरी बहस में कहीं लगा ही नहीं की देश के चोटी के बुद्धिजीवियों में किसी गंभीर मसले    को लेकर विमर्श  हो रहा   है . कई बार नौबत  हाथापाई   तक पहुँच  गयी जिसे संयोजक ने बड़ी मुश्किल से संभाला.  लगता था जैसे संघी सूरमा मार पीट कर अपनी बात मनवाएंगे . सबिंत पात्रा तो भाजपा का प्रवक्ता है और अपनी बेहयाई मुस्कान के  लिए सर्वज्ञात है ही लेकिन राकेश सिन्हा जो संघी विचारक कहा जाता है और जिसका नाम जे० एन० यू ० के अगले वाइस चांसलर के लिए प्रस्तावित बताया जाता है उसका बिगड़ा हुआ मानसिक संतुलन भी देखने योग्य था . उसने कहा कि साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार वापिस करने की मुहीम के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ और जन सस्कृति मंच के लोग हैं जो सरकार को अपनी राजनीति के दबाव में लेना चाहते हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि वामपंथ की विचारधारा अब विदा हो गयी है और संघ की विचारधारा ही देश की विचारधारा होगी .आगे कहा कि आर एस एस के देशभक्त कार्यकर्ता इमरजेंसी के खिलाफ जेल गए जबकि कम्युनिष्ट सरकार के साथ थे. 
उनके इस कथन का कामरेड अतुल अनजान ने कड़ा विरोध किया .उन्होंने कहा कि कयूनिष्ट इमरजेंसी ख़त्म होने तक जेल में रहे जबकि संघी माफ़ी माँगकर बाहर आ गए .संघ प्रमुख देवरस ने माफ़ी मांगी और जे० पीo को धोखा  दिया . उन्होंने बाल साहब देवरस के माफ़ी माँगने की बात कई कई बार चीख चीख कर कही .
देश के  लोगों को ये बात याद कर लेनी चाहिए कि आर० एस०  एस० द्वारा जनता से धोखा  करने और सत्ता के तलुवे चाटकर  माफ़ी माँगने की परम्परा  उसके जन्मकाल यानी कि अंग्रेजों के शासनकाल से ही चली आ रही है .वीर वाजपेयी से लेकर देवरस तक इनके साहस और शौर्य की गाथा जानने योग्य है .
 बहरहाल पुरस्कार तो बहुत नामी गिरामी साहित्यकारों ने वापिस किये हैं लेकिन जिस अंदाज में मशहूर  शायर  मनव्वर राणा ने वापिस किया है वो काबिले तारीफ़ है.न्यूज चैंनल पर बड़ी बहस में पुरस्कार वापिस करना बिलकुल वैसा ही अंदाज था जैसे भगत सिंह ने संसद में बम फेंककर और अदालत में इकबालिया बयान देकर किया था. अपने सन्देश को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से जन जन तक पहुँचाने के लिए मनव्वर राणा बधाई के पात्र हैं .हाँ सविंद पात्रा की धुलाई की इसलिए प्रशंसा नहीं करता हूँ क्यूँकि वो रोज धुलने पिटने से  ही  निखर कर भाजपा का मुख्य  प्रवक्ता  बना है .राजनीतिक प्रवक्ता बनने के लिए ऐसी ही बेहयाई की योग्यता की आवश्यकता होती है. जो विपक्षी के शब्द बाणों से तिलमिलाकर अपने प्रचार से विमुख हो जाते हैं वे योग्य प्रवक्ता नहीं होते हैं .इस मामले में राकेश सिन्हा से भी ज्यादा काबिल संविद पात्रा है. सरकार को चाहिए कि उन्हें वाइस चांसलर बनाने के लिए भी किसी यूनिवर्सिटी का निर्माण कर ले क्यूँकि उनके लायक  यूनिवर्सिटी भारत भर में कोई है नहीं और गोयबल्स वाला जर्मनी अब रहा नहीं जो वहीँ के लिए संस्तुति  की जा सके .

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