सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

'बछिया के ताउ'

     



दादरी काण्ड के बाद सोशल मीडिया में कुतर्कों की बारिश जारी है। वैसे मुझे दूसरों के दृष्टिकोण को कुतर्क या तर्कहीन कहने का कोई हक तो नहीं है लेकिन मेरी अपनी समझ है तो जैसे उन्हें अपनी बात कहने का हक है वैसे ही मुझे भी अपनी बात रखने का हक है।

.कुछ सेकुलर लोग खुलकर बीफ खाने के समर्थन में आ गये हैं। मुझे नहीं लगता कि उनमें से एक तिहाई भी बीफ खाते होंगे । अब जो खुद नहीं खाते हैं और खाना भी नहीं चाहते हैं वो किस प्रकार बीफ खाने की हिमायत कर सकते हैं ? यूॅं किसी के भोजन पर किसी अन्य की पसन्द नापसन्द का कोई मतलब नहीं है। सबको अपनी पसन्द का आहार लेने का हक है लेकिन बीफ खाने की हिमायत इस अन्दाज में करना जैसे उसका प्रचार किया जा रहा हो या उसको खुले में इस अन्दाज में खाना जैसे व्यवस्था और जन भावना को चुनौति दी जा रही हो, कतई सही नहीं है।
मैं उन लोगों में से नहीं हूॅं जो कहते हैं कि 'गाय हमारी मॉं है इसलिये जो इसे खायेगा वो इसी राह जायेगा।'
     गाय जिनकी मॉं है बैल जरूर उनका ताउ होगा| मेरा इनसे ऐसा करीबी रिश्ता नहीं है। मैंने अपनी मॉं का दूध पिया है या भैंस का दूध पिया है, गाय का दूध कम ही पीने का मिला है। जिस गाय का दूध पिया है वो अमरीकन गाय कहलाती है जिसे कुछ स्वदेशी आन्दोलन वाले सूअर और गाय की संकर नस्ल बताते हैं। मेरे ख्याल से उसे माता नहीं माना जाता होगा। लेकिन मेरे लिये सब बराबर है। जैसे लखनउ के एक मुस्लिम नौजवान ने अपनी नमाज छोडकर गाय को बचाया वैसे ही मैं भी हर बेजुबान जानवर को जीते देखना चाहता हूॅं। इस बात से कोई फर्क नहीं पडता है कि वह गाय है, भैंस है या बकरा है। जो लोग खाते हैं वो खायें लेकिन मेरे ख्याल से किसी की जान लेने से ज्यादा खुशी और सबाब किसी की जान बचाने से मिलता है। इसलिये जियो और जीने दो- इन्सानों को भी जानवरों को भी, परिन्दों को भी जलचरों को भी।
   'हजार फूल खिलने दो' की हिमायत वालों तुम्हारे हजार फूल भी तभी अच्छे खिलेंगें, अच्छे महकेंगें जब चहचहाने वाले हजार पक्षी होंगे, हजार भोंरे होगें हजार मधुमक्खियॉं होंगी, हजार तितलियॉं होंगी। तभी उन तितलियों के पीछे दौडते तुम्हारे तुतलाते बच्चें होगें। क्या तुम नहीं चाहते ऐसी दुनियॉं जहॉं फूल महकते हों, पंछी चहकते हों, तितलियॉं मडराती हो, मोर नाचते हों और बच्चे उनके जैसा बनने को मचलते हों ? फैसला आपको करना है आप कैसा देखना चाहते हैं खिल खिलाकर हॅंसते बच्चों की बस्ती या मौत के खौफ से सहमें बच्चों की बस्ती ?

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