बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

बीफ की अफवाह और मंहगी दाल


     केरल हॉउस में बीफ की अफवाह के बाद ये जरुरी हो गया है कि मोदी सरकार एक राष्ट्रीय खान पान आयोग का गठन करे जो यह तय करे कि देशवासी क्या खायेगें और क्या न खायेगें.यह आयोग देश के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों की जरूरतों और उपलब्धताओं के आधार पर ये तय कर सकता है कि लोग क्या खायें कैसे खायें ? जाहिर सी बात है कि बीफ खाने की अनुमति तो मिलेगी नहीं हाँ दाल खाने की सिफारिश जरूर होगी .अब दाल कैसे खायी जायेगी इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है .मोदी जी कहेंगे कि नितीश ने दाल वालों से चुनाव लड़ने के लिए पैसे लिए हैं इसलिए दाल के जमाखोरों पर छापे नहीं पड़ रहें हैं और मजबूरन जनता को दाल मंहगी खानी पड़ रही है और नीतीश बाबू कहेंगे कि मोदी ने पी एम बनने से पहले जमाखोरों से मोटा चंदा चुनाव लड़ने के लिए था इसलिए अब दाल की जमाखोरी करके जनता को मँहगी दाल खिला रहे हैं . 
हम कहते हैं कि चुनाव तो आप सभी लड़ते हैं और जाहिर सी बात है पैसे वालो के पैसे से ही चुनाव लड़ते हैं तो क्यों न ये माना जाए कि जनता को लुटवाने में तुम सबका साझा है ? 
अब दाल तुम खाने नहीं दोगे कुछ और खायें तो आप घर तक पीछा करते हो .क्या सरकार इसीलिए है कि वह भूख से मरने वालों की कुछ फ़िक्र न करे और कुछ खाकर पेट भरने वालों की निगहबानी करे ? 
इसलिए मैं कहता हूँ कि सरकार को अपनी खान पान नीति स्पष्ट कर देनी चाहिए .वैसे मामला खान पान तक ही रुकने वाला नहीं है ,यह पहनावा भी देखेगा, आपका रहन सहन भी देखेगा, आपका गाना बजाना सब देखेगा . क्या पहले लड़कियों के पहनावे को लेकर हंगामा नहीं किया गया है ? क्या अभी गीत संगीत के कार्यक्रमों को लेकर हंगामा नहीं किया गया है ? मतलब कि आम नागरिक कैसे जिए ?क्या खाए क्या पिए ? क्या ओढ़े क्या बिछाये ? कैसे गाये कैसे दफनाए ? सब कुछ गैर संवैधानिक संस्थायें और लोग एक चुनी हुई सरकार के माध्यम से तय करना चाहते हैं .सरकार भी रोकने टोकने का नाटक करते हुए ऐसे तत्वों को बढ़ावा देने में ही लगी है .ऐसे लोगों की धमकियां और मंसूबे टी वी चैनलों पर लगातार प्रसारित किये जा रहे हैं.ये इन संगठाओं के एजेंडे को फैलाने के साथ सत्ता जनता को आतंकित भी कर रहे हैं. क्या यह इक्कीसवीं सदी का भारत है या हम किसी तालिबानी स्टेट में रह रहे हैं ?सन सैंतालिस में भारत ने आजादी मिलने के साथ नेहरू के नेतृत्व में जिस उदार,लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले राष्ट्र के निर्माण के लिए कदम बढाए थे वो किधर खो गए हैं ? ये जो भारत हम देख रहे हैं इस भारत के स्वप्न तो किसी ने नहीं देखे थे न गांधी ने न नेहरू ने ,न सुभाष ने न भगत सिंह ने, न जिन्ना ने सावरकर ने. वो लोग जो धर्म निरपेक्ष नहीं धर्म सापेक्ष राष्ट्र चाहते थे उन्होंने भी ऐसी पाबंदियां नहीं चाही होंगी जैसी आज आम आदमी पर थोपी जा रही हैं .असल में यह एक ख़ास तरह की घृणा है जो दूसरों को लगातार परेशान करने, उत्पीड़ित करने और आतंकित करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है.इसका मकसद समाज के वर्ग विशेष को लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा से पीछे धकेल कर सत्ता और संसाधनों पर एकाधिकार करना है. आतंक इसका एक हथियार है .और जैसा सब कहते हैं आतंक का कोई धर्म नहीं होता है.इसलिए इन आतंकियों को वैसे ही निपटाया जाना चाहिए जैसे निपटाया जाता है . देश को चन्द सिरफिरों के हवाले नहीं किया जा सकता है. सरकार कुछ न करेगी तो एक दिन जनता जरूर इनके मुकाबले के लिए उठ खड़ी होगी .सरकार को चाहिए कि वो ऐसी कोई स्थिति न आने दे जिसमें कोई क़ानून को अपने हाथ में लेने का दुस्साहस करे . आम नागरिक ऐसी नहीं करना चाहता है और गिरोहबंद लोग इससे बाज नहीं आ रहे हैं .

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