रविवार, 6 दिसंबर 2015

अफसोस हम क्यूँ चुप रहे ?

मेरा घर है कि किताबो से भरे है कमरे
सोच ! इसमें भला हथियार कहा रखूँगा ?
अपने बच्चो से हर एक जुल्म छुपा लूंगा मगर
छ: दिसंबर ! तेरे अखबार कहा रखूँगा ..?
- शाहिद जमाल
Dhruv Gupt
6 दिसंबर की याद में
तुम चुप रहे हम चुप रहे / मख्मूर सईदी
जब हुक्म एक सादिर हुआ
तुम चुप रहे हम चुप रहे 
वो वक़्त कुछ कहने का था
तुम चुप रहे हम चुप रहे।
तक़रीर उसकी आग थी
शोले फिज़ा में भर गई
और शहर सारा जल गया
तुम चुप रहे हम चुप रहे।
लुटने लगी थीं बस्तियां
सोये हुए थे पासवां
चारों तरफ़ एक शोर था
तुम चुप रहे हम चुप रहे।
मंज़र भरे बाज़ार का
गिरना दरो-दीवार का
घर घर क़यामत थी बपा
तुम चुप रहे हम चुप रहे।
लफ़्ज़ों के सौदागर उठे
झोली भरी चलते बने
सौदा हमारा हो गया
तुम चुप रहे हम चुप रहे।
मख्मूर सईदी

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