बुधवार, 23 दिसंबर 2015

जन दबाव में कोर्ट का फैसला और संसद का कानून

यहॉं जन दबाव में कभी कोर्ट फैसला कर देता है कभी संसद कानून पास कर देती है। सब कुछ अफरा तफरी में होता है लेकिन सारी कसरत अपराधी को सख्त से सख्त सजा देने के लिये ही होती है उन स्थिति में बदलाव के लिये रत्ती भर कौशिश नहीं की जाती है जिसके कारण अपराध होता है, कोई बच्चा अपराधी बनता है। जितना जोर अपराधी को सजा देने पर है अगर उसका थोडा हिस्सा भी समाजिक बदलाव में लगाया जाये तो निश्चित रूप से अपराध कम होंगें लेकिन ऐसा करने का झंझट कौन ले ? इसमें काम करना पडता है. सबसे आसाान है किसी को अपराधी घोषित कर उसे सूली पर लटका देना. अब सूली पर लटका देने के बाद तो वो ये बताने आयेगा नहीं कि उसने अपराध किया या नहीं किया, किया है तो क्यूॅं किया है ? बाकि दूसरा कोई सवाल करेगा तो उसे देशद्रोही, समाजद्रोही और न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहरा दिया जायेगा . लेकिन ऐसा करने से भी समाज का तो कुछ भला तो होने वाला नहीं है. समाज का भला तो समाज सुधार से ही होगा और दण्ड समाज सुधार का रास्ता नहीं है। अगर ऐसा होता तो केवल थाने, कचहरी और जेलें होती स्कूल, चिकित्सालय और स्टेडियम ना होते. ये तय करने की जरूरत है कि हमारे समाज को किसकी जयादा जरूरत है थाने, कचहरी और जेल की है या स्कूल, चिकित्सालय और स्टेडियम की है ? एक सभ्य समाज में थाने कचहरी और जेलों की संख्या कम से कम होनी चाहिए स्कूल, स्टेडियम और अस्पतालों की संख्या अधिक होनी चाहिए .अस्पतालों की जरुरत भी कम ही होगी अगर आप स्कूल और स्टेडियम उलब्ध करा देते हैं .लेकिन स्टेडियम कॉमनवेल्थ गेम वाले नहीं चाहियें और न ही स्कूल नयी शिक्षा नीति वाले हों .वो सब ऐसे हों जिन तक आम आदमी की पहुँच हो न कि उन पर पैसे वाले या भरष्ट नेता कुँढली मारे बैठे हों. अगर ये सब आप नहीं कर सकते हैं तो आप कितने भी कड़े कानून बना लीजिये आप अपराध कम नहीं कर सकते हैं .

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