मंगलवार, 12 जनवरी 2016

लालकिले के कवि और लोकार्पण समारोहों के महाकवि

जो कवि लालकिले के कवि सम्मेलन में कविता पढ लेता है वो स्वयं को बडे कवियों में शुमार कर लेता है और अपने स्थानीय  कवि मित्रों  के साथ इस भाव से उठता बैठता है जैसे वो उनके साथ बैठकर उन पर कोई एहसान कर रहा हो तथा जिसका सम्मान करना उनकी पहली जिम्मेदारी है.  वह बिना मोटे लिफाफे के किसी काव्य गोष्ठी या कवि सम्मेलन में कविता पाठ करना अपना अपमान समझने लगता  है। उसकी आत्मा विदेश उड जाने के लिये तडफती रहती है और वह हमेशा इस जुगाड मे लगा रहता है कि कैसे अमेरिका या दुबई के  कवि सम्मेलन में काव्य पाठ का निमंन्त्रण मिले. उसे अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के  लिये देश का दायरा छोटा लगने लगता है । वह जब भी किसी कवि मित्र से या अपने किसी करीबी  से मिलता है तो यह बताना  नहीं भूलता कि जल्दी  ही वह अमेरिका या नैरोबी कविता पाठ करने के लिये जाने वाला है तथा उसके पास दिल्ली जयपुर के कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिये वक्त नहीं है।
          ऐसे कवियों को साहित्यिक पत्रिकाओं में लिखने छपने वाले कवि और लेखक कवि नहीं मानते हैं। उनकी नजर में कवि सम्मेलन में पढ़ी जाने वाली कवितायें कविता नहीं तुक बन्दी हैं। वे स्वंय ऐसी कवितायें लिखते हैं जिसे उनके और संपादक के अलावा कोई नहीं समझता है।  पर यदि कोई समालोचक उनकी कविता की किताब पर दो चार शब्द लिख देता है तो वे ऐसे भाव विभोर हो जाते हैं जैसे अज्ञेय के बाद वही सबसे बडे कवि हुये हैं और अब विश्वविद्वालयों में उनकी कविता पढ़ाया  जाना जरूरी  है. उन्हें लगता है कि  उनकी कविता ना पढ़ाकर उनके खिलाफ तो साजिश की ही गई है युवा पीढ़ी को भी नये साहित्य से वचिंत किया जा रहा है.
  इन लोंगों के बडे साहित्यकार होने का एक  पैमाना प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में इनकी पुस्तक का लोकार्पण होना भी है. आजकल सोशल मीडिया पर  प्रगति मैदान के पुस्तक मेले मे ऐसे बड़े साहित्यकारों की पुस्तकों के लोकार्पण के फोटो छाये हुये हैं. इनकी पुस्तकें  बहुमूल्य होती हैं यद्यपि उसमें गिनती के ही पन्ने होते हैं .लगभग दस रुपये का एक पन्ना होता है. इन किताबों को पाठक तो खरीदता है नहीं इसलिये इनके बहुमूल्य होने का कोई ज्यादा महत्व नहीं है. ये पुस्तकें जल्दी ही दरियागंज के रविवारी बाजार में फुटपाथ पर रद्दी के भाव बेचीं जाती हैं. ये जबरदस्ती दिमागों में ठेले जाने वाले कवि हैं जिन्हें आम जनता क्या आम साहित्य प्रेमी भी झेल नहीं सकता है.
   ऐसे लेखकों को ऐसे पाठक  जिन्हें  दिमागी कीड़े परेशान करते रहते हैं तथा जिनसे स्वयं को बचाये रखने के अल्लम गल्लम किताबों की खुराक खिलाते रहना जरूरी होता है वो  ही फुटपाथ से उठाकर   पढ़ा करते हैं. साहित्य का बाजार ऐसे साहित्यकारों के लीदत्व से गन्धा रहा है।
 प्रायोजित कवि सम्मेलन और पुस्तक लोकार्पण समारोहों के ये महाकवि जब तक जनता के कवि नहीं बनते हैं उनके रचे साहित्य का कोई महत्व  नहीं है.
 नोट : मैंने इसमें किसी का नाम नहीं लिखा है. साहित्य रसिक  अपनी पसन्द का नाम लिख सकते है. जिसका लिखेंगें उसका ही सटीक होगा.

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