बुधवार, 13 जनवरी 2016

'हंगामा है क्यूँ बरपा ?'


 
   पठानकोट पर आतंकवादियों ने हमला किया तो केन्द्र की भाजपा सरकार किंकत्तयविमूढ की स्थिति में आ गई। वह विपक्ष में होती तो पूरे देश में कोहराम मचा देती। धरना, प्रदर्शन और रास्ता जाम से लेकर संसद में घेराव और हंगामा करना उसका राष्ट्र भक्ति  का पहला काम होता। एक के बदले दस सिर लाओ की पुकार लगाकर चुनाव जीत लेना उसके लिये सबसे आसान है लेकिन सरकार में बैठकर फैसले  करना आसान  नहीं  है. आज वो सरकार में हैं और लोग उनसे कहते हैं कि जो मनमोहन सिंह की कमजोर सरकार ने नहीं किया वो आप  करके दिखाओ . लेकिन बडबोले पी0एम0 को आसमान से जमीन पर उतारना गवारा नहीं है। वो धरती पर तभी आते हैं जब उन्हें किसी देश का अतिथि बनना होता है। उन्हें विदेशी आतिथ्य का ऐसा शौक चढा है कि वो ये भूल गये हैं कि आदमी का पेट अपने घर के खाने से भरता है और घर में खाना तभी मिल सकता है जब घर सुरक्षित रहे। पठानकोट पर आतंकवादियों के हमले ने बता दिया है कि अपना घर सुरक्षित नहीं है। इसकी सुरक्षा के लिये शत्रुओं को क्या जबाब दिया जायेगा ? ये बताने में उनकी जुबान हकला रही है। वैसे उनका कहना है कि भारत पाकिस्तान के बीच वार्ता जारी रहेगी। पहले  ये होता था कि सबसे पहले दोनों देशों के बीच शान्ति वार्ता को स्थगित करके हालात का जायजा लिया जाता था और फिर उसके अनुसार आगे की कार्यवाही की जाती थी। अब लगता है गोली और बोली दोनों साथ साथ चलेंगी। जबकि कहीं भी ऐसा संभव नहीं होता है। लेकिन  भाजपा सरकार का  मुखिया कुछ ना कुछ अनोखा करने के लिये बेचैन हैं।
      राजनीतिक पण्डितों का अनुमान है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर समस्या के समाधान के लिये एक ऐसे फार्मूले पर सहमति बन रही है जो दोनों देशों में भूचाल तो जरूर लायेगा लेकिन हमेशा के लिये शान्ति कायम कर सकता है। ये फार्मूला वही है जिस पर दबे स्वर में आवाज उठती रहती है। इसके अनुसार पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को पाकिस्तान को सोंप दिया जायेगा और पाकिस्तान जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न भाग स्वीकार कर लेगा।
 इन अटकलों को इससे भी बल मिलता है कि पाक अधिकृत कश्मीर जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है और पाकिस्तान का संविधान और सुप्रीम कोर्ट भी जिसे पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता है उसे उसने अपने में मिलाने की कार्यवाही शुरू कर दी  है।उसने आजाद कश्मीर को अपने देश का एक और प्रान्त घोषित कर दिया  है और इसके लिये संविधान में संशोधन कर कथित आजाद कश्मीर का पाकिस्तान में विलय की प्रक्रिया को पूर्ण कर रहा है.
  पाकिस्तान की इस हरकत का पाक अधिकृत कश्मीर के नेताओं ने कडा विरोध करना शुरू कर दिया है लेकिन भारत में इसकी कोई चर्चा नहीं हो रही है। यहॉं के नेता पशिमी बंगाल में पाकिस्तानी गायक  गुलाम अली के साहित्यिक सॉंस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन पर बहस कर रहे हैं। उनके अनुसार जब बंगाल में साम्प्रदायिक उपद्रव की आग तथा पटानकोट में मारे गये सैनिकों की चिता की आग ठन्डी भी न हुई हो ऐसे में किसी पाकिस्तानी कलाकार को बुलाकर उसका गायन वादन सुनना देशद्रोह है।
     मेरे जैसे साहित्यिक मिजाज व्यक्ति को ये समझना मुश्किल हो रहा है कि जब राजनयिकों की वार्ता जारी रह सकती है, सैनिको की गोलाबारी जारी रह सकती है,आतंकवादियों की कार्यवाही  जारी  रह सकती है  तो कलाकारों, साहित्यकारों, खिलाडियों को क्यूॅं रोका जाता है ? क्या इस देश में समस्या इन गैर राजनितिक लोगों के सक्रिय रहने से ही है जो सरकार हमेशा इनसे खफा रहती है? मेरी समझ से यही वो लोग हैं जो दोनों देशों के बीच मौहब्बत के बीज बोते हैं वरना नेताओ और सेनाओं ने युद्ध और आतंकवाद को एक कारोबार बना लिया है जिसके कारण इस  उपमहाद्वीपके लोगों का शान्ति से जीना मुहाल हो गया  है।
अभी कुछ ही बरस बीते  हैं जब पाकिस्तान के गजल गायक मेंहदी हसन ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के घर आकर गाया था..........'रजिंश ही सही दिल से भुलाने के लिये आ'
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर जो रजिंश है उसे मिटाने के लिये वाजपेयी जी पाकिस्तान गये। वो स्वयं भी 'युद्ध ना होने देंगे' का शान्ति गीत गाया करते थे. ये अलग बात है कि उनके समय में ही कारगिल का युद्ध हुआ जिसमें सैकडों सैनिक शहीद हुये जिनकी अर्थियॉं देश भर में घुमाकर वोट बटोरी गयी। उन्हीं के समय में पोकरण में दूसरा परमाणु परीक्षण किया गया। उनकी समझ से  युद्ध न होने देने के लिये वो जरूरी था। उत्तरी कोरिया और ईरान भी उसी समझदारी का इस्तेमाल करते हुये स्वयं को परमाणु महाशक्ति बनाने में जुटे है। पाकिस्तान ने भी स्वयं को ऐसी ही महाशक्ति बना लिया है। हालाकि इन देशों के सभी लोगों को भरपेट रोटी नसीब नहीं है, पीने का पानी नसीब नही है, दवा नसीब नहीं है, शुद्ध हवा नसीब नहीं है। लेकिन हवा,दवा, रोटी, पानी फिजूल की बात है. असल बात है कन्धें पर बन्दूक और जेब में बम होना। जनता को भी ये चीजें यहॉं आसानी से उपलब्ध हैं और सरकार को भी। इसके लिये किसी को जबाब नहीं देना पडता है। ये देशभक्ति और वीरता की पहचान हैं। अमन शान्ति प्यार मौहब्बत के बीत गाने वाले शायर और कवि राष्ट््रभक्ति के आडे आते हैं लेकिन भाजपा राष्ट्र्भक्तों की पार्टी है इसलिये वो ऐसे कार्यक्रमों का विरोध करती है जिसमें यहॉं वहॉं के शायर अमन शान्ति और प्यार मौहब्बत के गीत गाते हैं। देश के सब लोग इतने समझदार और देशभक्त नहीं हैं इसलिये विवाद की जड वही हैं. आजकल भक्तगण ऐसे लोगों को ठिकाने  लगाने में जीजान से जुटे हैं।
गुलाम अली, मेंहदी हसन जिस जुबान के शायर हैं  वो उर्दू जुबान है जिसे सियासतदानों ने पराया कर दिया है लेकिन आम हिन्दुस्तानी जिसे अभी भी अपने दिल में बसाये है। जिसमें वह आज भी सोचता है, बोलता है लेकिन लिख पढ नहीं सकता है क्योंकि उसे पढने लिखने की सहूलियतें छीन ली गई हैं। उर्दू और हिन्दी में लिपि के अलावा और कोई  फर्क नहीं है ।तुलसी और जायसी की अपेक्षा मीर और गालिब  हिन्दी भाषी अपने ज्यादा करीब पाते हैं। जितना सहज उर्दु को बोलना समझना है उतना हिन्दी की उपभाषाओं को समझना नही है। हिन्दी उर्दू को भिन्न भाषा मानने वाले इस हकीकत से बखूबी वाकिफ हैं , ये अलग बात है कि हिन्दी की आम जनता में वैसी स्वीकार्यता नहीं है जैसी उर्दू की है। इसका एक उदाहरण ये भी है कि हिन्दुस्तान पाकिस्तान के उर्दू शायर तो दोनों देशों में आते जाते रहते हैं लेकिन हिन्दी के कवि पाकिस्तान नहीं जाते हैे।कारण वही है कि उर्दू शायरों को दोनों देशों कि आम जनता भी समझती है जबकि हिंदी कवियों को  नहीं समझती है .मैंने किसी हिन्दी कवि को पाकिस्तान में आम जनता के बीच काव्य पाठ करते नहीं सुना है यद्धपि साहित्यक सॉंस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता रहती है।
उर्दू दोनों देशों के लोगों को दिलों से जोड़ती है .उर्दू में लिखने पढने और गाने वालों का सम्मान करना हमारे लिए गर्व की बात है . फिर ये हंगामा क्यूं बरपा है ? उर्दू वह भाषा है जिसे दोनों देशों की आम जनता बोलती है जिसे गाँधी ने हिन्दुस्तानी नाम दिया था .

1 टिप्पणी:

  1. आदमी का पेट अपने घर के खाने से भरता है और घर में खाना तभी मिल सकता है जब घर सुरक्षित रहे।

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