मंगलवार, 19 जनवरी 2016

छात्र रोहित वेमुला


''मरे कोई खामोश रहें हम कुछ न बोलें
रोना भी अब सत्ता को मंजूर नहीं है .
ओ चुपचाप बैठने वालो तुम भी सुन लो  
मारे जाओगे चुप वो दिन दूर नहीं है .''
                 -------- अमरनाथ 'मधुर'


"यूँ क़त्ल पे, लड़को के, वो बदनाम ना होता
अफ़सोस कि फ़िरऔन को कॉलेज की ना सूझी"
-------- अकबर इलाहाबादी

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक पीएच.डी छात्र ने रविवार रात फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली.
ख़ुदकुशी करने वाले छात्र का नाम रोहित वेमुला था. वो दलित समुदाय से आते हैं.
पिछले दिनों रोहित सहित विश्वविद्यालय के पांच दलित छात्रों को हॉस्टल से निकाल दिया गया था.
मामला पिछले साल अगस्त में दो छात्रों के बीच हुए विवाद से जुड़ा बताया जा रहा है. इस विवाद में रोहित को कथित रूप से शामिल बताया जा रहा है.
25 साल के रोहित गुंटुर ज़िले के रहने वाले थे. वे विज्ञान तकनीक और सोशल स्टडीज़ में पिछले दो साल से पीएचडी कर रहे थे.
रोहित की आत्महत्या की ख़बर आने के बाद से तेलंगाना के छात्र संगठनों में नाराज़गी है. छात्र संगठनों ने इस घटना के विरोध में सोमवार को बंद की अपील की है.
इस मामले को लेकर तेलंगाना के साथ-साथ दिल्ली के जेएनयू समेत देश के कुछ और विश्वविद्यालयों के छात्र भी आंदोलनरत हैं.

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने रविवार रात ख़ुदक़ुशी से पहले पत्र लिखा. इस पत्र में रोहित ने अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं बताया. मौत से पहले उसने उन बातों की भी चर्चा की जिसने उसे परेशान कर रखा था. रोहित अपने जीवन में बहुत कुछ करना चाहता था लेकिन अंतत: उसने पत्र लिख कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. पढ़िये रोहित का अंतिम पत्र :


सुप्रभात,

जब आप मेरा पत्र पढ़ रहे होंगे, मैं आपके पास नहीं होऊंगा. आप मुझसे नाराज मत होइयेगा. मैं जानता हूं, आपमें से कई लोग मुझे सच्चे दिल से चाहते रहे हैं, प्यार करते रहे हैं और मेरा अच्छी तरह ख्याल रखते रहे हैं. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. मैं यह किसी की वजह से नहीं कर रहा, यह मेरी वजह से ही हुआ है, मुझमें ही परेशानियां थीं. मैं अपनी आत्मा और अपने शरीर के बीच बढ़ती दूरियों को महसूस करता रहा हूं और मैं एक दैत्य बन गया हूं. मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था. एक विज्ञान लेखक, बहुत कुछ लिखना चाहता था लेकिन आखिरकार, एक पत्र लिख पा रहा हूं.

मैंने विज्ञान, सितारों और प्रकृति से प्यार किया, इसके बाद मैंने इंसानों से भी प्यार किया. मैं यह नहीं जानता था कि लोग लंबे समय से प्रकृति से अपना रिश्ता तोड़ चुके हैं. हमारी भावनाएं दूसरे दर्जे की हैं. प्यार बस दिखावा है. हमारी मान्यताएं रंग-रोगन वाली हैं. मौलिकताएं कृत्रिम कलाओं द्वारा बनी है. अब यह असंभव हो गया है कि किसी को प्यार किया जाये उसे दुख पहुंचाये बगैर.

एक व्यक्ति की पहचान उसके पहचान और संभावनाओं तक ही सीमित कर दी गयी है. एक वोट तक, एक संख्या एक चीज तक. इंसान एक संख्या बन कर रह गया है. इंसान को कभी एक मस्तिक की तरह व्यवहार नहीं किया गया उसकी बौद्धिकता के आधार पर नहीं मापा गया एक तेजस्वी पुंज की तरह जो सितारों की धूल से बना हो. विविध पहलुओं में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, और मरने में तथा जीने में.

मैं पहली बार इस तरह का पत्र लिखा रहा हूं और शायद अंतिम पत्र लिखने का यह मेरा पहला अनुभव है. मुझे माफ कीजिए अगर मैं इसे और सार्थक बना पाने में असफल हो गया यह हो सकता है कि मैं गलत हूं, इस दुनिया को समझ पाने में कोई हड़बड़ी नहीं थी लेकिन मैं हमेशा जल्दीबाजी में रहता था. जीवन को शुरू कर पाने की शीध्रता में. ऐसे मौके में कुछ लोगों का जीवन अपने आप में श्राप होता है. मेरा जन्म मेरे लिए एक दुर्घटना है. मैं बचपन में अपने अकेलेपन से उबर नहीं पाया. मैं कभी प्रोत्साहित नहीं किया जाने वाला बच्चा था. मैं इस वक्त किसी तरह की तकलीफ में नहीं हूं, मैं दुखी नहीं हूं. मैं बस खाली हो गया हूं. अपने को लेकर निफिक्र यह बहुत ज्यादा सोचने वाली बात है. इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं.

जब मैं चला जाऊंगा तो लोग मुझे कायर, स्वार्थी, मूर्ख कह सकते हैं. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि मैं क्या कहा जाऊंगा मैं मौत के बाद भूत, प्रेत की कथाओं पर विश्वास नहीं करता. अगर किसी बात पर मैं विश्वास करता हूं तो वह यह है कि मैं सितारों की सैर कर सकता हूं. और दूसरी दुनिया के बारे में जान पाऊंगा.

मेरे इस पत्र को अगर आप पढ़ रहे हैं और कुछ करना चाहते हैं, तो 7 महीने की फेलोशिप राशि जो लगभग एक लाख पचहत्तर हजार रुपये हैं उसे मेरे परिवार तक पहुंचा दीजिए. मुझे 40 हजार रुपये रामजी को देना है उन्होंने कभी उस पैसे को लेकर मुझे नहीं टोका लेकिन कृपा करके उन्हें बकाया चुका दिया जाए.

मेरी अंतिम यात्रा को मौन और शांतिपूर्ण रहने दें, यह मान लें कि जैसे मैं आया और चला गया. मेरे लिए आंसू न बहाये यह मान लें कि मैं मौत के सुखी हूं उससे ज्यादा जब मैं जिंदा रहने पर था. 'परछाइयों से सितारों तक' उमा अन्ना, मुझे माफ कीजियेगा कि मैंने ऐसा करने के लिए आपके कमरे का इस्तेमाल किया. एएसए( अंबेडकर स्टूडेंट एसोशियेशन) परिवार के लिए, माफ करना मैं आप सब को निराश कर गया हूं. आपने मुझे काफी प्यार किया है. मैं भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहा हूं.
आखिर बार के लिए
जय भीम
                                                                                                               
मैं इस औपचारिक बात को लिखना भूल गया, मेरी इस खुदकुशी के लिए कोई जिम्मेवार नहीं है. किसी ने मुझे ऐसा करने के लिए नहीं उकसाया न अपने कृत्य से ना ही अपने शब्दों से. यह मेरा फैसला है और मैं अकेला व्यक्ति हूं, जो इसके लिए जिम्मेवार हूं. कृपया मेरे जाने के बाद, इसके लिए मेरे मित्रों और दुश्मनों को परेशान न किया जाये.
                                                                                                           

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