बुधवार, 27 जनवरी 2016

लेखकों की दुनिया -रसूल हमजातोव – अदभुत शब्‍द चितेरे


                                         
रसूल हमजातोव (8 सितम्‍बर 1923 – 3 नवम्‍बर 2003) दागिस्‍तान में बोली जाने वाली ऐसी अवार बोली के बेहतरीन लेखक हैं जिसे मात्र एक लाख सत्‍तर हजार लोग ही बोलते हैं। 20 लाख की कुल जनसंख्‍या वाले दागिस्‍तान में कुल 36 बोलियां बोली जाती हैं। वहां 9 भाषाओं में किताबें छपती हैं। उनके यहां एक कथा चलती है कि एक घुड़सवार पूरी दुनिया में भाषाएं बांटने निकला। उसने पहाड़ की खोह में भाषाओं से भरा एक बोरा फेंका और उन लोगों से कहा कि अपनी पसंद की भाषा चुन लो।
अरबी भाषा में रसूल का मतलब प्रतिनिधि होता है। वे दागिस्‍तान के सच्‍चे प्रतिनिधि हैं। अपनी जमीन के और वहां के वासियों के प्रतिनिधि। वे लोक गायक हैं, कवि हैं, कहानीकार हैं और बेहतरीन किस्‍सागो हैं।
पूर्वोत्‍तर काकेशस की तरफ पहाड़ों की गोद में जन्‍मे रसूल के पिता लोक गायक थे। वे बेहद लोकप्रिय आदमी थे। रसूल के पिता ही उनके कविता गुरु थे। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में वहां यह हालत थी कि उनके गांव की महिलाएं किसी रूसी आदमी का भाषण सुनते वक्‍त वक्‍ता की तरफ पीठ करके बुर्का पहन कर बैठती थीं लेकिन जब रसूल के पिता लोक गीत सुनाते तो वे उनकी कला का मान करने के लिए न केवल मुंह सामने करके बैठती बल्‍कि बुर्का भी हटा लेतीं।
रसूल ने ग्‍यारह बरस की उम्र में पहली कविता लिखी थी। वे केवल रूस के ही नहीं, पूरी दुनिया के चहेते लेखक हैं। वे इस मायने में भाग्‍यशाली रहे कि उन्‍हें बेहतरीन रूसी अनुवादक मिले। वहां से चल कर उनकी कविताएं पूरी दुनिया में पहुंचीं।
रसूल को स्‍टेट स्‍तालिन पुरस्‍कार, लेनिन पुरस्‍कार और अंतर्राष्‍ट्रीय बोतेव लेखन पुरस्‍कार के अलावा बीसियों सम्‍मान मिले। प्‍यार तो उन्‍हें दुनिया भर के पाठकों का मिला!
वे पिछले पचास बरस से रूस के सबसे चहेते कवि हैं। छोटे गीत, लंबी वर्णनात्‍मक कविताएं, लोक गीत, जीवन के गूढ़ दर्शन को बयान करती उनकी रचनाएं सब कुछ है उनके खजाने में।
रसूल को बचपन से ही अवार कहानियां, किस्‍से और लोक गीत सुनने का बहुत शौक था। वे कहानी सुनने के लालच में तीन दिन तक पड़ोसी का घोड़ा चराते रहे, एक बार स्‍कूल से गायब हो कर अपने पिता के एक बूढ़े दोस्‍त से किस्‍से कहानियां सुनने के लिए बारह मील तक पैदल चल कर गये। तब वे सिर्फ दूसरी क्‍लास में पढ़ते थे। बूढ़ा आदमी लगातार चार दिन तक रसूल को किस्‍से सुनाता रहा। रसूल घर लौटा तो उसकी दिलो दिमाग में और कॉपियों में यही गीत भरे थे। एक बार तो सिर्फ एक ही गीत सुनने के लालच में आधा दिन पहाड़ की चढ़ाई चढ़ कर गये थे।
पहाड़ों की भोली भाली लड़कियां रसूल के गीत सुन कर उन्‍हें प्‍यार भरे खत लिखती थीं। एक बार उन्‍होंने देखा कि एक चरवाहा उनकी कविता वाले पेज को रोल करके सिगरेट बना कर पी रहा है तो उन्‍हें बेहद तकलीफ हुई थी।
उन्‍होंने कुछ दिन पढ़ाया, थियेटर में काम किया और एक स्‍थानीय अख़बार में भी काम किया। वे अवार भाषा में अपनी कुछ किताबें लेकर 1945 में मास्‍को के गोर्की साहित्‍य संस्‍थान में गये। ये उनके कैरियर का टर्निंग पाइंट था। उनकी कुल 40 किताबें हैं।
मेरा दागिस्‍तान उनकी बेहतरीन आत्‍मकथात्‍मक कृति है। यह विश्‍व साहित्‍य की अनमोल साहित्‍य सम्‍पदा है। उसमें प्रेम, संबंध, अपनी मातृभूमि, अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में इतनी आत्‍मीयता और विश्‍वास के साथ लिखा गया है कि ऐसा लगने लगता है कि पाँच सौ पेज की लंबी कविता पढ़ रहे हैं।
एक बार मैं अपना एक व्‍याख्यान तैयार कर रहा था। सोचा मेरा दागिस्‍तान की कुछ बेहतरीन पंक्‍तियों को आधार बना कर अपना व्‍याख्‍यान शुरू करूंगा। जब मैंने किताब में अपने काम की पंक्‍तियों को अंडरलाइन करने का काम खत्‍म किया तो मैंने पाया कि मैं पेज दर पेज कम से कम 50 पेज अंडरलाइन कर चुका था और अभी किताब के 65वें पेज पर ही पहुंचा था।
                                 ------ले0सूरज प्रकाश 

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