मंगलवार, 1 मार्च 2016

रोहित वेमूला की आत्महत्या और कन्हैया की पिटाई का विवाद


हैदराबाद के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या और जे एन यू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया की पिटाई का विवाद अब शान्त होता दिख रहा है. आज के हालात को लेकर दोनो ही मसलों ने जो वस्तुतः एक ही हैं मेरे मन में एक दहशत सी पैदा कर दी  की है. मैं इन पर जब  भी सोचता हूॅं एक ठन्डी सिहरन सी बदन में दौड जाती है.
 रोहित वेमूला के प्रकरण में बोलते  हुये केन्द्रीय मंत्री स्मृति  ईरानी ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया है उसमें उनके द्वारा सिर काटकर चरणों में रख  देने वाले डायलाग ने बडी ख्याति  प्राप्त कर ली है. वहीं मायावती के इस वक्तव्य पर कि वह उनके बयान से सन्तुष्ट नहीं हैं इसलिये वो अपना कहा पूरा करें को  सुनकर मंत्री महोदया ने हॅंसते हुए  जो ये कहा कि बसपा के कार्यकर्ता आयें और उनका सिर काटकर ले जायें इसे सुनकर बडा ही दुख होता है कि एक होनहार नौजवान की मौत का कैसे मजाक उड़ाया  जा रहा है. लगता है जैसे उस नौजवान की मौत इनके लिये दुख और शर्म की बात न होकर दिल्लगी की बात है. ऐसा तब और भी दुखदायी लगता है जब पता चलता  है कि 24 फरवरी को जिस वक़्त स्मृति इरानी लोकसभा में रोहित वेमुला की मौत से माँ की तरह दु:खी होने का ज़बरदस्त अभिनय कर रही थीं, ठीक उसी वक़्त रोहित वेमुला की माँ राधिका वेमुला को दिल्ली पुलिस इंडिया गेट की सड़क पर घसीट रही थी। क्या ये  मंत्री और सांसद संसद में सिर लेने देने का नाटक खेल ने के लिए हैं इन्होंने रोहित की मान के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले पुलिस वालों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं करायी है ?
   दूसरी तरफ  जे एन यू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया  की पुलिस कस्टडी में मजिस्ट्रेट  के सामने पिटाई का प्रकरण है. ये देखकर अफसोस होता है कि पुलिस के भारी बन्दोबस्त के बीच भी काले  कोट  वाले शैतान जान से मारने की नीयत से मारपीट करते हैं और मजिस्ट्रेट  और पुलिस चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं. ये शर्मनाक काण्ड देश के सूदूर हिस्से मनीपुर, नागालैण्ड, कष्मीर या छत्तिसगढ में नहीं होता है देश की राजधानी दिल्ली में होता है. मुझे इससे भारत के बंटवारे के वक्त का ख्याल आता है. इस घटना से देश बॅंटवारे के वक्त के हालात का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि लौग पुलिस और फोज के होते हुये भी अपनी हिफाजत को लेकर कितने बेबस और असुरक्षित रहें होंगे. क्या राज नेताओं की कुर्सी की  कुत्सित लिप्सा यूँ ही आम आदमी का लहू पीती रहेगी ?  क्या सुरक्षा बल इंसानियत की हिफाजत भी करेगें या राजनेताओं कि इच्छाओं का गुलाम रहेंगें ? ये बन्दूक ये वर्दी ये रुतबा ये ओहदा आम आदमी की कमाई के टैक्स से है राजनेताओं की बख्शीश से नहीं है . अगर कोई भी सरकारी वेतनभोगी  आम आदमी की सेवा और सुरक्षा में कोताही करता है तो उसे अपने पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है . क्या ही अच्छा होता कि पुलिस कुछ आत्मबल से काम लेती और उन काले शैतानों को गिरप्तार कर कन्हैया के साथ ही मजिस्ट्रेट के सामने पेश ये कहकर पेश करती कि ये कानून के बड़े अपराधी हैं . लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक बेबस नौजवान मारा पीटा जाता रहा चिल्लाता रहा . अगर ऐसे हालात का सामना किसी खास व्यक्ति या समुदाय को करना पडे तो उसके मन में व्यवस्था के प्रति सदा सदा के लिये नफरत के भाव क्यूॅं नही जड जमा लेंगे?
भारत और पाकिस्तान के बीच की नफरत को इस नजरिये से समझने की भी जरूररत है जो इस उपमहाद्वीप  में अनेक समस्याओं के लिये जिम्मेदार है।
     क्या हम आज फिर देश विभाजन की दिशा में बढ रहे हैं ? देश विभाजन न सही समाज में विभाजन के बीज जरूर बो दिए गए हैं . राजनेता इसे खाद पानी भी जरूर देगें ताकि वोटों की बढ़िया फसल काट सकें . देश के सबसे बड़े सूबे में चुनाव भी तो नजदीक हैं उसकी तैयारी अभी से तो होगी .

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