रविवार, 13 मार्च 2016

आँख में सुअर का कॉर्निया


'हिन्दुस्तान अखबार की खबर है कि चीन के डाक्टरों ने ग्वांगडोंग प्रांत के एक किशोर की आँख में सुअर की आँख का कॉर्निया प्रत्यारोपित किया है . ऑपरेशन सफल रहा है .किशोर को अपनी आँख से बढ़िया दिखाई दे रहा है . यह ऑपरेशन ग्वांगझाऊ झोंगशेन यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया है .[ हिन्दुस्तान : पृष्ठ संख्या 16 ,दिनांक 12 मार्च 2016 ] '
अभी तक यही सुनते आये हैं कि फलां आदमी की आँख में सूअर का बाल है लेकिन आँख में सुअर का कॉर्निया पहली बार सुना है .इससे पहले असम  में एक डाक्टर द्वारा मनुष्य के शरीर में सूअर का दिल प्रत्यारोपित करने की खबर भी आई थी .उसके कामियाब होने का तो पता नहीं चला लेकिन उस डाक्टर को पुलिस द्वारा गिरप्तार कर जेल भेज देने की खबर पढ़ी थी . ये भारत है, चीन नहीं है. यहाँ कुछ नया करने वाले को प्रोत्साहित नहीं दण्डित किया जाता है . इसलिए यहाँ नयी खोज कम ही होती है . 
 बहरहाल एक बात समझ में नहीं आती है कि जब  आदमी बन्दर का वंशज  है तो फिर बन्दर के अंगों का प्रत्यारोपण क्यों नहीं किया जाता है ? अगर बन्दर और आदमी में कुछ भी समानता है जो कि वंशज होने के कारण होनी ही चाहिए तो बन्दर के अंगों का प्रत्यारोपण मानव के ज्यादा अनुकूल होता लेकिन ऐसा नहीं है. वैसे भी आदमी को 'सूअर की औलाद' कहकर पुकारते तो सुना है लेकिन किसी को बन्दर की औलाद कहते नहीं सुना है .इसका मतलब है कि आदमी का सूअर से कुछ न कुछ रिश्ता जरूर है .अब ये तो हो नहीं सकता कि चीन वाले सूअर के बच्चे हो और बाकी दुनिया वाले शेर या गीदड़ के बच्चे हों. वैसे शेर या गीदड़ भी जानवर ही होते हैं. इसलिए 'सूअर का बच्चा' कहे जाने से किसी को खफा होने का कोई कारण मेरी समझ में तो आता नहीं है. जहाँ तक सूअर के गन्दा होने की बात है तो इसमें भी कुछ विशेष बात नहीं है. बहुत से आदमी हैं जो सूअर की गन्दगी भरी जिंदगी से भी गंदी जिंदगी जीते हैं लेकिन फिर भी समाज में ऊंट की तरह गर्दन टेडी करके चलते हैं . उन्हें तो कोई कुछ नहीं कहता है.  उनके सामने आम आदमी भेड़ बकरियों की तरह मिमियाता रहता है .
           इससे और कुछ साबित हो या न हो इतना तो साबित हो ही जाता है कि आदमी में भेड़ ,बकरी,शेर,सूअर बन्दर,ऊंट,गधा, हाथी. गेंडा, मुर्गा, चूहा, सांप ,गिरगिट ,खरगोश, कछुआ, मगरमच्छ ,कीड़े मकौड़े, मक्खी, मच्छर सबका कुछ ना कुछ अंश है .शायद सबका श्रेष्ठ अंश जो मनुष्य के लिए उपयोगी है, सुविधाजनक है. कवियों और शायरों ने तो मनुष्य के अंदर न जाने क्या क्या देखा है. उन की  उपमाएं और कल्पनायें आश्चर्य चकित कर देती हैं .मनुष्य को  प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना यूँ ही नहीं कहा जाता है. वो ऐसा है. इसलिए आईन्दा किसी भी आदमी को किसी जानवर के नाम से सम्बोधित करने से पहले ये जरूर सोच लें कि हमारे अंदर भी उस जानवर का अंश है जिसे हम हेय समझते हैं. वो तो बिलकुल ना कहें जिनके यहाँ भगवान भी वराहावतार लेते हैं .

1 टिप्पणी:

  1. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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