बुधवार, 23 मार्च 2016

फागण के दिन चार री सजनी

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फागण के दिन चार री सजनी
फागण के दिन चार री सजनी, फागण के दिन चार ।
मध जोबन आया फागण मैं
फागण बी आया जोबन मैं
झाल  उठे सैं मेरे मन मैं
जिनका बार न पार री सजनी, फागण के दिन चार ।

प्यार का चन्दन महकन लाग्या
गात का जोबन लचकन लाग्या
मस्ताना मन बहकन लाग्या
प्यार करण नै तैयार री सजनी, फागण के दिन चार ।

गाओ गीत मस्ती मैं भर के
जी जाओ सारी मर मर के
नाचन लागो छम छम कर के
उठन दो झंकार री सजनी, फागण के दिन चार ।

चन्दा पोंहचा आन सिखिर' मैं
हिरणी जा पोंहची अम्बर मैं
सूनी सेज पड़ी सै घर मैं
साजन करे तकरार री सजनी, फागण के दिन चार ।
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मैं तो गोरी-गोरी नार, बालम काला-काला री!
मेरे जेठा की बरिये, सासड़ के खाया था री?
तेरे जेठा की बरिये मन्नै बरफी खाई री।
वा तो बरफियां की मार जिबे धोला-धोला री!

मेरे देवर की बरिये, सासड़ के खाया था री?
 तेरे देवर के बरिये मन्नै लाडू खाये री।
वा तो लाडुआँ की मार जिबे पीला-पीला री!

मेरे बालम की बरिये, सासड़ के खाया था री?
तेरे बॉलम की बरिये मन्नै जामण खाये री।
वा तो जामणा की मार जिबे काला-काला री!
मैं तो गोरी-गोरी नार, बालम काला-काला री!!
...........................मैं तो गोरी-गोरी नार, बालम काला-काला री!!

रचनाकार - अज्ञात
प्रेषक - आरती शर्मा

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