बुधवार, 30 मार्च 2016

फिर क्या लिखेंगे बोलो झूठे ये कलम घिस्सू ?


अब कैसे रोकूँ आँसू ? हँस हँस के निकल आये . 
किस बिल में छिपे पहले ,ये नागपुर के जाये . 

पहले जो मिले होते, हिटलर इन्हें बुलाता, 
गोयबेल्स की जगह इनको ओहदे पे वो बिठाता. 

हिटलर न याद इनको, गुजरात नहीं दिखता.
अमरीकी सैम अंकल से इनका सगा रिश्ता.

शत्रु हैं वामपंथी,दुश्मन दलित हैं सारे,
मौैका मिले तो पहले मुस्लिम को चुन के मारें .

लेकिन मरेगा इनके ना कोई अब यूँ मारे,
हम मर के जी उठेंगे मिल के लड़ेंगे सारे. 

फाड़ेंगे झूठ के सब ये कागजी पहाड़े,
हट जाओ दूर हमसे कोई ना आये आड़े .

अब भी लहू रगों में बहता है लाल अपने 
अब भी सजा के रखे हमने हसीन सपने 

ये लाल ध्वज प्यारा, खूॅं से रंगा हमारा 
कहता रहा है हमसे, भूलों नहीं ये नारा 

कुछ भी ना पास अपने खोने को बेड़ियों के
हम एक हो लड़ेंगें पूंजी के भेडियो से .

मजदूर राज होगा ना सिर पे ताज होगा 
जिसमें हों सब बराबर ऐसा समाज होगा .

जाति धर्म का झगड़ा,ये द्वेष पिछड़ा अगड़ा 
मिट जाएगा बस यूँ ही. हमने ज़रा जो रगड़ा 

फिर क्या करेंगे बोलो हाँ ये सियासी पिस्सू ?
फिर क्या लिखेंगे बोलो झूठे ये कलम घिस्सू ?

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