रविवार, 17 अप्रैल 2016

गुड़गाँव का गुरुग्राम और मेवात का नूंह


हरियाणा सरकार ने गुड़गाँव का नाम बदलकर गुरुग्राम और मेवात का नूंह रखने का फैसला किया है.नाम बदलने का काम पहले से होता आया है .जब कुछ नया करना आसान नहीं होता है तो नाम बदल कर ही नया काम करने की मानसिक संतुष्टि कर ली जाती है .कई बार नाम बदलने के कुछ ऐतिहासिक सांस्कृतिक कारण भी होते हैं लेकिन आम तौर से ये सत्तारूढ़ लोगों की सोच का परिणाम होता है .जैसा कि हम सभी अवगत हैं कि वर्तमान में हरियाणा और केंद्र में उन लोगों की सरकार है जो भारत की पुरातन संस्कृति और परंपरा के प्रति विशेष आग्रह और अनुराग रखते हैं .ये अलग बात है कि उनकी सोच को बहुत सारे लोग संकीर्ण समझते हैं और उससे कतई इत्तफाक नहीं रखते हैं लेकिन ये तो अपने अपने ख्याल की बात है .हरेक से हरेक की सहमति कुछ जरुरी भी तो नहीं है .
लेकिन क्यूँकि  मामला जन भावना और व्यवहार  से जुड़ा है इसलिए इस पर कुछ ठहर कर सोचने की जरुरत है .आखिर इन दोनों शहरों के नाम बदलने की ऐसी क्या जरुरत आ पड़ी है . कहा जा रहा है कि गुड गांव गुरु द्रोणाचार्य का स्थान है और उसका प्राचीन और शुद्ध नाम गुरुग्रामही है इसलिए उसे गुरुग्राम पुकारा जाना चाहिए .बात बिलकुल सही है .इससे ये भी पता चलता है कि गुरु द्रोणाचार्य जो कौरव पांडवों के ही नहीं एकलव्य    के भी गुरु थे आज भी हमारे लिए कितने श्रद्धेय हैं .आज भी गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर खेल प्रशिक्षकों को सरकारी पुरस्कार दिया जाता है तो फिर उनके नाम पर शहर का पुनर्नामकरण क्यों न किया जाये ? लेकिन आम जनता तो इतनी पढ़ी लिखी नहीं होती है वो गुरुग्राम को गुड़गांव  ही कहेगी. यूँ भी अब भारत के महाभारत वाले सुनहरे दिन कहाँ हैं जब व्यक्ति के हालात बिगड़ जाने पर हर्षवर्धन का हरसू ,परसुराम का परसा,लक्ष्मीचन्द का लक्खी हो जाता है तो नगर का नाम भी बदल सकता है .
  भाषा के विकास की दृष्टि से ये परिवर्तन सकारात्मक माना जाता है .भाषाएँ जटिलता से सरलता की और बढ़ती हैं .  गुरुग्राम बोलने से गुड़गांव बोलना सहज है लेकिन कुछ पढ़े लिखे लोगों को इसमें गंवारूपन  की बू आती है . ये ग्रामवासियों को हीन दृष्टि से देखने की प्रवृति का परिणाम है . जबकि अब ऐसा वक्त आ गया है जब महानगरवासी प्रदूषण से इतने दुखी हैं कि वे दूर दराज के गाँवों की जिंदगी  को हसरत की नजर से देखते हैं .इसलिए ग्रामवासियों की भाषा या रहन सहन को लेकर किसी तरह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए .
गुड़गांव का नाम बदलने की बात तो फिर भी समझ में आती है लेकिन मेवात का नाम बदलने का कोई कारण समझ में नहीं आता है .मेवात बोलने में आसान है इसलिए उसका नाम नहीं बदला जाना चाहिए .
    नाम बदलने के लिए दो बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए .सबसे पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि उसका उच्चारण आसान हो .दूसरा यह भी देखा जाना चाहिए कि वह अपने हमनाम से थोड़ा भिन्न हो.जैसे हैदराबाद [सिंध ]और हैदराबाद [आंध्र प्रदेश ] दोनों बड़े शहर हैं .अब हैदराबाद [सिंध ] का नाम तो नहीं बदला जा सकता है लेकिन अगर आंध्र प्रदेश  के हैदराबाद का नाम हैदरगढ़ या हैदरपुर जैसा कुछ रख दिया जाये तो इसमें कुछ हर्ज नहीं है.
नाम के साथ हीनता और गौरव का भाव भी अनायास आ जाता है .यदि ऐसा न होता तो लोग अपने नाम के साथ सिंह जैसा विशेषण न लगाते .आखिर गुरुगोविंद सिंह ने यूँ ही तो अपने शिष्यों का नामकरण सिंह के साथ नहीं किया था .लेकिन वक्त के साथ उसके भी भाव गिर जाते हैं .जिन लोगों के  नाम के साथ मल लगा होता है जैसे खचेडूमल, करोड़ीमल आदि उनके  नाम का मल, मल्ल [पहलवान] से है लेकिन अब शायद ही कोई उन्हें पहलवान का सम्मान देता हो .
नाम ही है जो जयचन्द गद्दारी का पर्याय हो जाता है और लंकाभेदी  विभीषण राम भक्त होने पर भी कोई माँ बाप उसके नाम पर अपने बच्चों का नाम नहीं रखता है . भक्तों नाम की महिमा अपरम्पार  है ज्यादा भक्ति भाव वालों को जनता ज्यादा दिन भाव नहीं देती है .

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