बुधवार, 11 मई 2016

'मंटो फिर पैदा नहीं होगा '-------कृशन चंदर




महान कथाकार सआदत हसन मंटो की जन्मतिथि 11 मई को पड़ती है। मंटो भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे कहानीकार हैं, जिनकी ख्याति और प्रासंगिकता उनकी मृत्यु के बाद भी लगातार बढ़ती जा रही है। यहां प्रस्तुत हैं उनकी मृत्यु पर लिखे गए मित्र कथाकार कृशन चंदर के आत्मीय संस्मरण के अंश :

सआदत हसन मंटो
जन्म:  11 मई 1912, समराला
मृत्यु: 18 जनवरी 1955, लाहौर

एक अजीब हादसा हुआ है। मंटो मर गया है, गो वह एक अर्से से मर रहा था। कभी सुना कि वह एक पागलखाने में है, कभी सुना कि यार दोस्तों ने उससे संबंध तोड़ लिया है, कभी सुना कि वह और उसके बीवी-बच्चे फाकों पर गुजर कर रहे हैं। बहुत सी बातें सुनीं। हमेशा बुरी बातें सुनीं, लेकिन यकीन न आया, क्योंकि एक अर्से में उसकी कहानियां बराबर आती रहीं। अच्छी कहानियां भी और बुरी कहानियां भी। ऐसी कहानियां जिन्हें पढ़कर मंटो का मुंह नोंचने का दिल चाहता था, और ऐसी कहानियां भी, जिन्हें पढ़कर उसका मुंह चूमने को जी चाहता था। ये कहानियां मंटो के खैरियत के खत थे। मैं समझता था, जब तक ये खत आते रहेंगे, मंटो खैरियत से है। क्या हुआ अगर वह शराब पी रहा है, क्या शराबखोरी सिर्फ साहित्यकारों तक ही सीमित थी? क्या हुआ अगर वह फाके कर रहा है, इस देश की तीन-चौथाई आबादी ने हमेशा फाके किए हैं। क्या हुआ अगर वह पागलखाने चला गया है, इस सनकी और पागल समाज में मंटो जैसे होशमंद का पागलखाने जाना कोई अचम्भे की बात नहीं। अचम्भा तो इस बात पर है कि आज से बहुत पहले पागलखाने क्यों नहीं गया। मुझे इन तमाम बातों से ना तो कोई हैरत हुई, न कोई अचम्भा हुआ। मंटो खैरियत से है, खुदा उसके कलम में और जहर भर दे।

अजीब इत्तेफाक है। जिस दिन मंटो से मेरी पहली मुलाकात हुई, उस रोज मैं दिल्ली में था। जिस रोज वह मरा है, उस रोज भी मैं दिल्ली में मौजूद हूं। उसी घर में हूं, जिसमें चौदह साल पहले वह मेरे साथ पंद्रह दिन के लिए रहा था। घर के बाहर वही बिजली का खंभा है, जिसके नीचे हम पहली बार मिले थे। यह वही अंडरहिल रोड है, जहां ऑल इंडिया रेडियो का पुराना दफ्तर था, जहां हम दोनों काम करते थे। यह मेडन होटल का बार है, यह मोरी गेट, जहां मंटो रहता था, यह वह जामा मस्जिद की सीढि़यां हैं, जहां हम कबाब खाते थे, यह उर्दू बाजार है। सब कुछ वही है, उसी तरह है। सब जगह उसी तरह काम हो रहा है। ऑल इंडिया रेडियो भी खुला है, मेडन होटल का बार भी और उर्दू बाजार भी, क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह गरीब साहित्यकार था। वह मंत्री न था कि कहीं झंडा उसके लिए झुकता। वह कोई सट्टेबाज ब्लैक मार्केटिया भी नहीं था कि कोई बाजार उसके लिए बंद होता। वह कोई फिल्म स्टार न था कि स्कूल और कॉलेज उसके लिए बंद होते। वह एक गरीब सताई हुई जबान का गरीब और सताया हुआ साहित्यकार था। वह मोचियों, तवायफों और तांगेवालों का साहित्यकार था। ऐसे आदमी के लिए कौन रोएगा। कौन अपना काम बंद करेगा, इसलिए ऑल इंडिया रेडियो खुला है, जिसने उसके ड्रामे सैकड़ों बार ब्रॉडकास्ट किए हैं। उर्दू बाजार भी खुला है, जिसने उसकी हजारों किताबें बेची हैं और आज भी बेच रहा है। आज मैं उन लोगों को हंसता हुआ देख रहा हूं, जिन्होंने मंटो से हजारों रुपयों की शराब पी है। मंटो मर गया तो क्या हुआ, बिजनेस, बिजनेस है। क्षण भर को भी काम नहीं रुकना चाहिए।

वह जिसने हमें अपनी सारी जिंदगी दे दी, उसे हम अपने समय का एक क्षण भी नहीं दे सकते। सिर झुकाए क्षण भर के लिए उसकी याद को अपने दिलों में ताजा नहीं कर सकते— शुक्र के साथ, आजिजी के साथ, दिली हमदर्दी के साथ बेकरार रूह के लिए जिसने 'हतक', 'नया कानून', 'खोल दो', 'टोबा टेक सिंह' ऐसी दर्जनों बेमिसाल और अमर कहानियों की रचना की। जिसने समाज की निचली तहों में घुस कर उन पिसे हुए, कुचले हुए, समाज की ठोकरों से विकृत चरित्रों का निर्माण किया, जो अपनी अपूर्व कला और यथार्थ चित्रण में गोर्की के लोअर डेप्थ्स के चरित्रों की याद दिलाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उन लोगों ने गोर्की के लिए अजायबघर बनाए, मूर्तियां स्थापित कीं, नगर बसाए और हमने मंटो पर मुकदमे चलाए, उसे भूखा मारा, उसे पागलखाने पहुंचाया, उसे अस्पतालों में सड़ाया और आखिर में उसे यहां तक मजबूर कर दिया कि वह इनसान को नहीं, शराब की एक बोतल को अपना दोस्त समझने पर मजबूर हो गया था।

मंटो बयालीस साल की उम्र में मर गया। अभी उसके कुछ कहने और सुनने के दिन थे। अभी-अभी जिंदगी के कड़वे तजुर्बों ने, समाज की बेरहमियों ने, वर्तमान-व्यवस्था के आत्म-विरोधी ने उसकी बेतहाशा व्यक्तिवादिता, अराजकता और तटस्थता को कम करके उससे 'टोबा टेकसिंह' जैसी कहानी लिखवाई थी। गम मंटो की मौत का नहीं है। मौत लाजिमी थी। मेरे लिए भी और दूसरों के लिए भी। गम उन अनलिखी रचनाओं का है, जो सिर्फ मंटो ही लिख सकता था। उर्दू साहित्य में अच्छे-से-अच्छे कहानीकार पैदा हुए, लेकिन मंटो दोबारा पैदा नहीं होगा और कोई उसकी जगह लेने नहीं आएगा। यह बात मैं भी जानता हूं और राजेन्द्र सिंह बेदी भी, इस्मत चुगताई भी, ख्वाजा अहमद अब्बास भी और उपेन्द्रनाथ अश्क भी। हम सब लोग भी उसके प्रतिद्वंद्वी, उसके चाहने वाले, उससे झगड़ा करने वाले, उससे नफरत करने वाले, उससे मुहब्बत करने वाले, दोस्त और हमसफर थे। और आज जब वह हममें नहीं है, हममें से हर एक ने मौत के शहतीर को अपने कंधे पर महसूस किया है।

आज से चौदह बरस पहले मैंने और मंटो ने मिलकर एक फिल्मी कहानी लिखी थी, 'बंजारा'। मंटो ने आज तक किसी दूसरे साहित्यकार के साथ मिलकर कोई कहानी नहीं लिखी—  न उसके पहले, न उसके बाद। लेकिन वे दिन बड़ी सख्त सर्दियों के दिन थे। मेरा सूट पुराना पड़ गया था और मंटो का सूट भी पुराना पड़ गया था। मंटो मेरे पास आया और बोला- 'ऐ कृशन। नया सूट चाहता है?' मैंने कहा, ' हां'। 'तो चल मेरे साथ'। 'कहां?' 'बस,ज्यादा बकवास न कर, चल मेरे साथ'।  हम लोग एक डिस्ट्रीब्यूटर के पास गये। मैं वहां अगर कुछ कहता तो सचमुच बकवास ही होता, इसलिए मैं खामोश रहा। वह डिस्ट्रीब्यूटर फिल्म प्रोडक्शन के मैदान में आना चाहता था। मंटो ने पंद्रह-बीस मिनट की बातचीत में उसे कहानी बेच दी और उससे पांच सौ रुपये नकद ले लिए। बाहर आकर उसने मुझे ढाई सौ दिए, ढाई सौ खुद रख लिए। फिर हम लोगों ने अपने-अपने सूट के लिए बढि़या कपड़ा खरीदा और अब्दुल गनी टेलर मास्टर की दुकान पर गए। उसे सूट जल्दी तैयार करने की ताकीद की। फिर सूट तैयार हो गए, पहन भी लिए, अब्दुल गनी की सिलाई उधार रही और उसने हमें सूट पहनने के लिए दिए। मगर कई माह तक हम लोग उसका उधार न चुका सके। एक दिन मंटो और मैं कश्मीरी गेट से गुजर रहे थे कि मास्टर गनी ने हमें पकड़ लिया। मैंने सोचा, आज साफ-साफ बेइज्जती होगी। मास्टर गनी ने मंटो को गरेबान से पकड़ कर कहा, 'वह 'हतक' तुमने लिखी है?' मंटो ने कहा, 'लिखी है तो क्या हुआ? अगर तुमसे सूट उधार लिया है तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरी कहानी के अच्छे आलोचक भी हो सकते हो। यह गरेबान छोड़ो!' अब्दुल गनी के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कुराहट आई। उसने मंटो का गरेबान छोड़ दिया और उसकी तरफ अजीब-सी नजरों से देखकर कहने लगा, 'जा, तेरे उधार के पैसे माफ किए'।

आज मुझे जब यह घटना याद आई तो मैं उस वक्त अब्दुल गनी की दुकान ढूंढ़ता कश्मीरी गेट पहुंचा। मगर अब्दुल गनी वहां से जा चुका था। कई बरस हुए पाकिस्तान चला गया था। काश, आज अब्दुल गनी टेलर मास्टर मिल जाता, उससे मंटो के बारे में बातें कर लेता। और किसी को तो इस बड़े शहर में इस फिजूल काम के लिए फुरसत नहीं है। शाम के वक्त मैं जोय अंसारी, एडिटर, 'शाहराह' के साथ जामा मस्जिद से तीस हजारी अपने घर को आ रहा था। रास्ते में मैं और जोय अंसारी आहिस्ता-आहिस्ता मंटो की शख्सीयत और उसके आर्ट पर बहस करते रहे। सड़क पर गड्ढे बहुत थे, इसलिए बहस में बहुत से नाजुक मुकाम भी आए। एक बार पंजाबी कोचवान ने चौंककर पूछा- 'क्या कहा जी, मंटो मर गया?' जोय अंसारी ने आहिस्ता से कहा, 'हां भाई!' और फिर अपनी बहस शुरू कर दी। कोचवान धीरे-धीरे तांगा चलाता रहा। लेकिन मोरी गेट के पास उसने अपने तांगे को रोक लिया और हमारी तरफ घूमकर बोला- 'साहब, आप लोग कोई दूसरा तांगा कर लीजिए। मैं आगे नहीं जाऊंगा'। उसकी आवाज में एक अजीब-सा दर्द था। इससे पहले कि हम कुछ कह सकते, वह हमारी तरफ देखे बगैर अपने तांगे से उतरा और सीधा सामने की बार में चला गया।

                                                                    -------------  कृशन चंदर 

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