सोमवार, 16 मई 2016

नाम वापसी

संघी सरकार ने पूरी बेशर्मी के साथ अपने कुत्सित इरादों को जाहिर ही  नहीं  किया है उस पर अमल भी शुरू कर दिया है .सारे साम्प्रदायिक अपराधी एक एक कर रिहा करने का काम तेजी से चल रहा है .इसी के साथ ये भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि जो लोग भी इनके कारनामों में बाधक रहे हैं या पीड़ितों के मददगार रहे हैं उन्हें जल्द से जल्द जेल की सलाखों  के पीछे भेज दिया जाए .  ऐसे तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ता और एन जी ओ अपनी सुरक्षा के लिए मारे मारे फिर रहे हैं और सरकार उन्हें घेरने में जुटी है .अब काले धन वापसी और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात कोई नहीं करता है ,अब किसानों की आत्महत्या और फसलों के वाजिब दाम की बात कोई नहीं करता है .सूखे को लेकर ट्रेन से पानी पहुँचाने का नाटक तो किया जाता है लेकिन नदियों को जोड़ने की बात कोई नहीं करता है .जैसे ये समस्याएं अब समस्याएं न रही हों. अब एक ही काम बचा है कि अपने भगवा गिरोह के लोगों को जेल से आजाद कराकर प्रतिष्ठित पद पर बिठाओ और तमाम संस्थानों का संघीकरण करो. लोग हल्ला करें तो कुछ फिजूल की बहसों में उलझ दो .कभी लव जेहाद के नाम पर तो कभी घरवापसी के नाम पर. कभी गौमाता  के नाम पर तो कभी भारत माता की जय के नाम पर . अब उन्होंने शहरों के नाम बदलने की मुहीम शुरू कर दी है .पहले गुड़गांव का गुरुग्राम और मेवात का नूंह नामकरण किया  गया था अब मुजफ्फरनगर ,लखनऊ ,बनारस .पटना .फैजाबाद,अहमदाबाद ,हैदराबाद आदि पंद्रह शहरों का नाम बदल जाएगा .यह भी घर वापसी की तरह  नाम वापसी है.तर्क दिया जा रहा है कि जो पुराने नाम हैं, वही रखे जा रहे हैं विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने नाम बदल दिए थे तो क्या वो नाम हमेशा चलते रहेंगे ?
ना जी बिलकुल नहीं चलने चाहिए, लेकिन ये तो बताईये यहाँ विदेशी कौन नहीं है ? और नाम बदलने का ये सिलसिला कहाँ तक जायेगा ?बाहर से मुसलमान आये हैं, मुग़ल, पठान आये हैं तो हिन्दू आर्य ब्राह्मण भी आये हैं. लेकिन आप उन्हें बाहर से आया मानते ही नहीं हो किन्तु  आपके न मानने से क्या होता है? इस देश में द्रविड़ हैं. भील हैं .राक्षस हैं ,नाग हैं, असुर हैं उनकी  भी बस्तियां रहीं होंगी उनके भी कुछ नाम रहे होंगे वे सब किसने मिटाए ? क्या वे हिन्दू आर्यों ने नहीं मिटाए हैं ? क्या उनकी बस्तियों के अवशेषों पर खड़े नगरों को उनका नाम दिया जाएगा ? हम जानते हैं आप ऐसा हरगिज नहीं करने वाले हैं .हमारी ऐसी कोई माँग भी नहीं है.वक्त के साथ जो परिवर्तन हुए हैं और जिनसे कुछ बहुत ज्यादा परेशानी नहीं है उन्हें स्वीकार कर लिया गया है. उन्हें अब नहीं छेड़ा जाना चाहिए. हाँ हैदराबाद जैसे नाम को अवश्य बदला  जाना चाहिए क्यूँकि हैदराबाद नाम से पाकिस्तान में भी एक बड़ा शहर है .लेकिन उसका नया नाम  मिलता जुलता ही होना चाहिए उसे हैदरगढ़ या हैदरपुरम नाम दिया जा सकता है .बाकी नामों को बदलने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है .ना ही आम जनता ने ऐसी कोई माँग की है .आम जनता तो रोटी दाल और पानी माँग रही है और आप हैं कि उसे नये नये नामों का झुनझुना थमा रहे हैं .ये तो उससे भी ज्यादा भद्दा मजाक है जब रोटी माँग रही भूखी भीड़ को केक खाने का सुझाव दिया गया था .केक से कम से कम कुछ पेट तो भर सकता था लेकिन नाम से ना पेट की भूख मिटती है ना प्यास बुझती है .और सरकार है कि यही करने में व्यस्त है. ऐसी निकम्मी सरकार को पांच साल तक बर्दाश्त करना पड़ेगा ये सोचकर ही झुरझुरी होने लगती है. लेकिन जिन्दा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करती हैं. हमें भी पांच साल तक हाथ पे हाथ रख कर नहीं बैठा रहना चाहिए. हम अगर अभी जिन्दा हैं और जिंदगी  में यकीन करते हैं तो एक सार्थक बदलाव के लिए कमर कसकर मैदान में उतर पड़ें यही वक्त का तकाजा है .इंकलाब  जिंदाबाद .

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