मंगलवार, 17 मई 2016

किताबों की दुनिया


हमें भी दिखा दो किताबों की दुनिया


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हमें भी दिखा दो किताबों की दुनिया
हमारा भी मन है कि स्कूल जाएँ
पहाड़ा रटें और गिनती सुनाएँ
ककहरा से बातें करें और सीखें
कहाँ लगती हैं कौन सी मात्राएँ
गुणा-भाग को जोड़ बाक़ी को समझें
ज़रा हम भी देखें हिसाबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……
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हमें अक़्ल से कोई पत्थर न समझे
जो बदले न ऐसा मुक़द्दर न समझे
कि हम लड़कियाँ भी बराबर हैं क़ाबिल
हमें कोई लड़कों से कमतर न समझे
हमें भी तमन्ना है देखें तुम्हारे
सवालों की दुनिया जवाबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……
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पढ़ेंगे लिखेंगे तो आगे बढे़ंगे
तरक़्क़ी की सीढ़ी पे हम भी चढ़ेंगे
समझ को नई रोशनी दे सके जो
वो साइंस का पाठ हम भी पढ़ेंगे
कि हमको भी अब रास आने लगी है
पढ़े लिक्खे लोगों के ख़्वाबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……
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ये सूरज का गोला ये चंदा ये तारे
हवा में टँगे हैं ये किसके सहारे
इस आकाश में और क्या क्या छुपा है
हमें घेरे रहते हैं ये प्रश्न सारे
हमारी तरह है कि हमसे अलग है
फ़लक पर चमकते नवाबों की दुनिया।
हमे भी दिखा दो……
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बहारों के मौसम ख़िजाओं के झोंके
ये गर्म और ठण्डी हवाओं के झोंके
ये बिजली ये बादल ये बारिश की रिमझिम
लरज़ती गरजती सदाओं के झोंके
कहाँ तक है रंग और ख़ुशबू का आलम
कहाँ तक है काँटों गुलाबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……

अगर हम को तालीम हो जाए हासिल
तो आगे की नस्लों को मिल जाए मंज़िल
मिला कर तुम्हारे क़दम से क़दम हम
करें दूर मिल-जुल के आए जो मुश्किल
नया रूप देकर नए रंग भरकर
बना दें इसे कामयाबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……
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तुम्हारी तरह ये हमारा भी हक़ है
हमारा भी हक़ है हमारा भी हक़ है
हमें भी दिखाओ हमें भी दिखाओ
हमें भी दिखाओ किताबों की दुनिया।
हमें भी दिखा दो……
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ओम प्रकाश नदीम

ग़ज़लकार और संस्कृतिकर्मी 

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