शनिवार, 11 जून 2016

'किसानों का दुश्मन है सारा जमाना

'किसानों का दुश्मन है सारा जमाना 
किसानों का दर्द किसी ने न जाना 

नील गाय को मारने को लेकर विवाद जारी है. मारने वाले ठहर गए हैं और अनुमति देने वाले सहम गए हैं .मामला गाय का है और पशुओं के सरंक्षण  के लिए काम करने वाली भाजपा नेता मेनका गाँधी के एतराज का भी. यद्यपि दोनों का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है. क्यूँकि ना तो नील गाय गाय है और न ही पशु वध को कोई रोक सकता है .अगर पशु वध को रोकना ही है तो गाय,भैंस ,ऊंट, बकरे, सूअर ,मुर्गे क्यों काटे जा रहे हैं ? केवल गाय का नाम आते ही हंगामा शुरू हो जाता है जबकि सब जानते हैं कि नील गाय गाय नहीं है घोड़े और हिरन की नस्ल का जीव है जिसका सही नाम वनरोज है. लेकिन जीव अधिकार सरंक्षकों  का कहना है कि  मारा तो उन्हें  भी नहीं जाना चाहिए. तब किसानों का क्या हो जो पहले ही सूखे और मंदी की मार से तबाह होकर आत्महत्या की डगर पर हैं ? क्या सारी आफ़तें किसान के सर पे ही डाली जायेगी ? कुदरत वक्त पर बारिश नहीं करती है ,बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि होती है,कुछ पैदा हो जाता है तो कोई सही दाम देकर खरीदता नहीं है .बैंक और साहूकार तगादों से जीना हराम कर देते हैं . फिर भी किसान को कितना तंग किया जाता है .कहीं नील गाय कहीं जंगली और पालतू सूअर, कहीं बन्दर और कहीं गुलदार, कहीं हाथी उसकी फसल को बर्बाद करते रहते हैं . ये पशु अधिकारों के सरंक्षक इन सारे पशुओं को अपने घर में क्यों नहीं पाल लेते हैं ? अगर ऐसा करें तो इन्हें कुछ पुण्य भी मिलेगा और इनके  पशु प्रेम  पर भी जनता कि मुहर लग जायेगी .लेकिन नहीं सब किसान की पीठ पर सवार होकर पुण्य कमाना चाहते हैं . ये जानवरों से प्यार करने वाले आम आदमी से गहरी नफ़रत करते हैं . वरना किसानों  के बारे में भी कुछ सोचते कि उनकी जिंदगी किन मुसीबतों में  कट रही है.  
      कहा जाता है कि आदमी ने जानवरों की जगह छीन ली है इसलिए वो खेतों में, बस्तियों में उतर आये हैं .ये बात आंशिक रूप में  सही है . लेकिन किसानों ने जानवरों की जगह नहीं छीनी है बल्कि सरकारों और माफियाओं   ने जिनमें खनन माफिया ,भू माफिया, वन माफिया तमाम तरह के माफिया शामिल हैं ,ने जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास से बेदखल किया है .ये माफिया और सरकार किसानों की भूमि पर भी बदनजर रखते  है और ये दोनों मिलकर किसी ना किसी बहाने उनकी  भूमि  हड़पते  रहते हैं .वस्तुत अब सरकार माफिया नहीं चलाते हैं बल्कि माफिया खुद सरकार हैं .इसलिए सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि जो खेती को अलाभकारी पेशा बना  रही है . जिसका मकसद यही है कि किसान तंग आकर औने पौने दामों में अपनी जमीन बेचकर मजदूर बन जाए .उसे ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़े उसके सारे इंतजाम सरकार ने किये हैं .आवारा पशुओं और क्रूर बाहुबली भूमाफियों को  सरंक्षण देना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है . जहाँ इस सबके बावजूद आदिवासी किसान अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं वहाँ वो अपनी पुलिस और फ़ौज भेज कर किसानों को खेतों से परे धकेल देती है .फिर इस प्रकार हासिल की गयी जमीन  उद्योग धंधों के नाम पर काले धन वालों को भारी कमीशन लेकर बेच दी  जाती  है. उनसे कोई नहीं कहता है कि कुछ नील गाय, कुछ सूअर, कुछ बन्दर आप भी अपने यहाँ पाल लो . सरकार कुछ बाड़े इन जानवरों के लिए भी तो छोड़ सकती है. किसान को उजाड़ने के लिए इन्हें आजाद छोड़ने  कि क्या तुक है ?
हम किसी को जान से मारने की हिमायत नहीं करते हैं लेकिन किसी को आत्महत्या करने के लिए विवश  किये जाने का पुरजोर विरोध करते हैं . नील गाय को मारने पर रोक लगाने वाले किसान को आत्महत्या के लिए विवश करने के अपराधी हैं. अगर वो अपराध मुक्त होना चाहते हैं तो नील गायों और अन्य आवारा पशुओं के लिए कोई उचित वयवस्था करें और उन्हें  किसान के खेत से दूर रखें .ध्यान रहे उर्द, अरहर ,चना आदि दालों की मंहगाई के पीछे इन आवारा पशुओं द्वारा विशेष रूप से दलहन फसलों को बर्बाद करना भी एक बड़ा कारण है .किसान उस फसल को क्यों बोयेगा जिसके तैयार होने पर उसे आधी चौथाई  भी उपज नहीं मिलती है ? गन्ना और गेहूं काफी कुछ इन आवारा पशुओं से बच जाता है लेकिन दलहन फसलों में एक दाना नहीं बचता है . अब ये मामला किसानों का ही नहीं आम आदमी की दाल रोटी का है .जो लोग आम आदमी की दाल रोटी छीनेंगे जनता उन्हें माफ़ नहीं करेगी .

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