गुरुवार, 16 जून 2016

हर लम्हा यही कहते हुए रात गुजारी
हरगिज नहीं मैं तुमको कभी याद करूँगा.

मालूम है तू मेरे मुकद्दर में नहीं है
ख़्वाबों को मगर तुझसे  ही आबाद करूँगा .

खत तूने मुझे सैकड़ों लिखें हैं यकीनन
कासिद से मैं अपने लिए फ़रियाद करूँगा.


माना कि मैं दीवाना हूँ,कुछ होश नहीं है
पर तुझको ना रुसवा किया ना आज करूँगा .








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