शुक्रवार, 17 जून 2016

कैराना से पलायन पर विवाद

कैराना से पलायन पर विवाद जारी है. भाजपा पलायन करने वालों की नित नयी सूची तैयार कर रही है और सपा सरकार मुस्तैदी से उसे खारिज करने में लगी है .ऐसा लगता है जैसे सरकार इस सूची से ही बनने बिगड़ने वाली है .भाजपा के नेताओं ने ऐलान कर दिया है कि वो आगामी चुनाव में कैराना और मथुरा  को मुद्दा बनायेंगे.यू पी के युवा समाजवादी मुख्य मंत्री बेचैन है कि ये दुबारा अयोध्या कार्ड जैसा खेल खेलना चाहते हैं. यूँ भी अयोध्या, मथुरा, कांशी जब जब चुनाव आते हैं भाजपा को याद आने लगते हैं .अबकी कांशी ना सही कैराना सही .बाकी अयोध्या मथुरा वही हैं .मुख्य मंत्री जी  कहते हैं कि हम अपनी सरकार की उलब्धियों जनता के सामने रखेंगे भाजपा चाहे तो अपनी केंद्र सरकार की उपलब्धियां लेकर जनता के सामने आये ताकि जनता स्याह सफ़ेद देख सके . लेकिन अमित स्याह किस सरकार की उपलब्धियां लेकर जनता के सामने जायें ? अभी तक भाजपा सरकार  ने हवाई यात्राओं और हवा हवाई बातों के अलावा कुछ किया नहीं है.पंद्रह लाख खातों में आने की बात छोडिए स्वच्छ भारत और स्टार्टअप इंडिया का भी कुछ अता पता नहीं है. जाहिर है कि उपलब्धियों के नाम पर छप्पन इंची सीने क्या  गज भर लम्बी जुबान भी अंदर सरक जाती है और हर हर मोदी चिल्लाने वाले भक्त अरहर को याद करने लगते हैं. अच्छे दिन आये हैं .लेकिन इतने अच्छे नहीं कि वो यू पी में चुनाव जिता सकें .इसलिए ले दे के वही हिन्दू मुस्लिम, हिन्दू मुस्लिम का घिसा पिटा लेकिन पुराना पक्का खटराग बचता है जिसके दम पर चुनाव जय करने के मंसूबे पाले जा रहे हैं . सारे देश की तरह यू पी के लोग भी मंहगाई और सूखे से परेशान हैं. किसान को फसल का  उचित दाम नहीं मिलता  हैं और नौजवान को काम नहीं मिलता है.लेकिन इसकी चिंता  भाजपा के नेताओं को नहीं है. कैराना से जाने वालों की चिंता करने वालों अगर आपको जनता  की इतनी ही चिंता है तो कैराना के आसपास कुछ बड़े उद्योग स्थापित करो फिर देखना कैराना क्या हरियाणा पंजाब तक से लोग वहाँ बसने चलें आएंगे. एक भी हिन्दू वहाँ से कहीं नहीं जाएगा .लेकिन अगर कोई रोजगार ना हो तो कैराना क्या कलकत्ते से भी लोग  विदेश चले जाते हैं . इसलिए चुनाव में जीतना है तो अपने कामों उपलब्धियों को जनता के सामने रखो. वरना बसपा आ ही रही है अपने संगमरमर के हाथियों को लेकर .उसके संगमरमर के हाथी भी साइकिल से होड लेना चाहते हैं अब ये जनता फैसला करेगी कि वो पत्थर के हाथी चाहती है या साइकिल पर लैपटॉप लेने जाती है. कीचड में खिलने वाले कमल को तो वो शायद ही चाहेगी क्यूँकि उसका तजुर्बा ये बताता है कि वो कीचड में गले तक सन जाती है लेकिन कमल उसके हाथ नहीं आता है, उसकी  कोई माल्या माला बनाकर विदेश ले उड़ जाता है. अब बार बार कीचड में सनने से अच्छा है वो संगमरमर के हाथियों पार्कों को निहारे या लैपटॉप पे टिप टिप करे. शीर्षासन विकास नहीं है विकास इसे भी कहते हैं .शीर्षासन तो हम सदियों से करते आये हैं. लेकिन आजकल शीर्षासन, भुजंगासन को विकास बताया जा रहा है. हम ऐसे विकास पर सवाल करें तो हमें विकास विरोधी ही नहीं देशविरोधी कहा जाता है. देश विरोधी घोषित होते ही किसी भी दंगाई को हमें सड़क चलते पीटने का सरकारी लाइसेंस  मिल जाता है जिससे कोई सुरक्षा कवच हमारा बचाव नहीं कर सकता है .मेरा अभी ठुकने  पिटने का कोई इरादा नहीं है.इसलिए जब तक कैराना की कराह बंद नहीं होती है मैं चला शीर्षासन करने .जय भारत माँ नहीं नहीं भारत माता की इ इ इ .....जय . वनडे मातरम वनडे मातरम .            

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