सोमवार, 20 जून 2016

जोर शौर का योग दिवस


                                    
   21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जोर शौर से मनाने का अभियान उरूज पर है. अब से पहले  योग को लेकर ऐसा उत्साह दुनिया भर में  कहीं देखने सुनने में नहीं आया है. योग की इस लोकप्रियता  का श्रेय किसे  है? बाबा राम देव को? मोदी को ? या स्वंय  योग को ? इसमें कोई संदेह नहीं है कि बाबा राम देव ने योग को जन जन तक पहुँचाया है लेकिन पी एम मोदी ने भी इसके प्रचार प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इस लिए इन दोनों महानुभावों  की तमाम आलोचनाओं के बावजूद योग को लोकप्रिय बनाने में इनके योगदान को स्वीकार किया जाना चाहिए.इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि योग का आध्यात्मिक महत्व कुछ हो या ना हो लेकिन वो एक उपयुक्त व्यायाम है जो हर व्यक्ति की जरूरतों को पूरा कर सकता है.सही व्यायाम सही वक्त पर किया जाए तो उसके स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ मिलते ही हैं और स्वास्थ्य लाभ को किसी धर्म या अध्यात्म क्रिया की जरुरत हो या ना हो उचित व्यायाम और उचित खानपान की जरुरत हमेशा रहती है . इस हिसाब से पी टी या ड्रिल भी एक योग है और नमाज तो स्वयं में पूर्ण योग ही है. नमाज के जो भी स्टेप हैं वो सब स्वास्थ्य को किसी न किसी प्रकार लाभ पहुंचाते हैं .शरीर को चुस्त दुरुस्त बनाते हैं और कई स्टेप तो अनेक बीमारियों को भी दूर करते हैं .लेकिन मुस्लिम धर्म गुरुओं ने नमाज के इस पक्ष की कभी बहुत चर्चा नहीं की है और ना ही ऐसा करने पर जोर दिया है .उन्होंने नमाज को इस्लाम का जरुरी हिस्सा माना है और उसी रूप में स्वीकार करने पर जोर दिया है. अब हर आदमी तो मुसलमान हो नहीं सकता है लेकिन क्या वो अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए ऐसी क्रिया नहीं कर सकता है? अगर स्वास्थ्य लाभ के लिए योग कोई भी कर सकता है तो वो सब आसन किये जा सकते हैं जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं .  तब ऐसा क्यों न हो कि सुबह उठते ही सप्ताह में एक दिन मौलाना सबको नमाज पढ़ायें, एक दिन योग गुरु योग करायें, एक दिन,फौजी अफसर ड्रिल करायें, एक दिन स्कूल मास्टर पी टी करायें, एक दिन दारा सिंह कुश्ती करायें, एक दिन मिल्खा सिंह दौड़ लगवाएं और सप्ताह के अंतिम दिन किसी सत्संग में ले जाएँ . आखिर इसमें बुराई क्या है ? एक दिन में भले ही कोई ना सीखे लेकिन धीरे धीरे सब सीख जायेगें . सुबह को एक दो घंटा देने की ही तो बात है वो सब देंगे. लेकिन सरकार कुछ ऐसा करने लायक जनता को छोड़े भी तो सही. नौजवानों को कुछ काम नहीं है वो रोजगार न मिलने से परेशान हैं. जिन्हें नौकरी मिल जाती है वो काम के दबाव और समय के अभाव से परेशान हैं .अब सुबह को छ: बजे काम पर निकलने वाले और रात को दस बजे घर लौटने वाले या सारी रात काम पर रहकर सुबह छ बजे आने वाले या रात को दो बजे काम पर जाने वाले और दिन में तीन बजे आने वाले से आप ये उम्मीद करें की वो नियमित समय पर योग करे ये संभव नहीं है . रिक्शा खींचने वाले,बोझा ढोने वाले, ऊँचे टावर पर चढ़कर काम करने वाले, कचरा बीनने वाले, झाड़ू पोंछा करके अपना पेट भरने वाले मजदूर वर्ग  के किसी स्त्री पुरुष से योग के लिए कहना एक हिमाकत है . किसी कर्ज में डूबे, फसल का दाम ना मिलने से दुखी और बेटे की फीस या बेटी के विववह के लिए चिंतित किसान से योग के लिए कहना एक मजाक के सिवा क्या है ? आज का योग केवल भरे पेट वालों की अपच को दूर करने की वर्जिश है, कुछ मुटियाये लोगों को छरहरा बनाने का छलावा है, कुछ शातिर कारोबारियों को कारोबार का नया अवसर है, कुछ ढकोसलेबाज़ नेताओं को पॉपुलर होने का नुस्खा है लेकिन भूखे ,बेरोजगार,बेघर,बेदर, लोगों के लिए इससे कोई राहत नहीं मिलने वाली है . हाँ अगर एकाध दिन योग करने से एकाध दिन कुछ राहत मिल जाये तो ऐसा करने में कुछ हर्ज भी नहीं है. बाकी आम जनता की समस्याएं वैसे  ही सुलझेंगी जैसे वो सुलझनी चाहिए जैसा सरकारें सुलझा नहीं रही हैं या सुलझाना नहीं चाहती हैं .

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