शुक्रवार, 24 जून 2016

बया और बन्दर की कहानी


मौसम फिर बरसात का आया,बचना है तो नीड बनायें
लेकिन उस मोटे बन्दर को कोई ये कैसे समझाये ?
चाहे दिन भर सारे वन में शाखा शाखा कूदो फाँदों
घर आएगा याद तुम्हें तब, जब बरसेगा सावन भादो.
तब बाहर वाला ना कोई, तुमको अपना घर सौंपेगा
तब जिसका अपना घर होगा वो अपने घर सोयेगा.
आज तुम्हें समझाते हैं हम, मर्जी है मानो मत मानो
महल, दुमहले गैर ना नापो खुद अपना छप्पर तुम तानो .
वरना बारिश में भीगोगे, दादा, परदादा से बैठे.
हम भी फिर से दोहरायेंगे क्या किट किट करते हो ऐंठे ?
देखो फिर से तुम क्रोधित हो, नीड हमारा तोड़ ना देना
आज बहुत मुश्किल होता है तिनका तिनका जोड़ यूँ लेना.
हरी घास का नाम नहीं है,कीकर के ना पेड़ खड़े हैं
चाहे जिधर घूमकर देखो कंक्रीट के महल बड़े हैं .
मुश्किल है तिनका पा लेना, वृक्ष कोई छतनार ढूंढना
और मुझे अच्छा न लगता बेघर यूँ बेकार घूमना .
इसीलिए आओ हम दोनों मिलकर ऐसा नीड बनायें
वर्षा में जिसमें हम बैठे भुट्टे खायें, गाने गायें .
वर्षा का आनंद तभी है, तभी हमें कुछ मान मिलेगा
केवल अपने घर पड़ौस ना सारा मीत जहान मिलेगा.

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