शनिवार, 11 जून 2016

तस्लीमा है नाम वही .



लिखना है तो सबसे पहले तस्लीमा का नाम लिखो  
उसके आगे उसको मेरे सौ सौ रोज सलाम लिखो .
कठमुल्लों को खुली चुनौती देती रोज दहाड़ रही
जो उसकी आवाज दबायें उनको खूब लताड़ रही.
डटी रहो तस्लीमा यूँ ही जलते हुए शरारे सी
तुझसे नयी रौशनी आती अपने घर के द्वारे भी .
पूरब से पश्चिम तक जितने सोच लिए हैं मर्दानी
नाम तुम्हारा सुनकर उन मर्दों की मर जाती नानी.
तुमने मर्दों से आगे बढ़ अपना हर हक़ छीना है
बता दिया औरत को कैसे इस दुनिया में जीना है .
'माथे के आँचल का परचम बन जाना' है काम यही
जिस के साथ डटे रहना है तस्लीमा है नाम वही .


  

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें