गुरुवार, 21 जुलाई 2016

कहता है मेरा खामा



कहता है मेरा खामा किस किसको मैं बाँधू
बादल से चले आते हैं मज़मूं मेरे आगे .
                --------- साहिर लुधियानवी
बांग्लादेश में मजहबी अतिवादियों ने मासूम नौजवानों का कत्ल कर दिया जिसके विरुद्ध सोशल मीडिया पर बहुत आक्रोश देखने को मिला. मैंने सोचा कुछ दिन इन इस्लामी पहलवानों की खबर ली जाए लेकिन ज्यादा दिन नहीं हुए की कश्मीर में पृथकतावादी मिलिटेंट बुरहान मुजफ्फर बानी की मुठभेड़ में मौत के बाद कोहराम मच जाने की ख़बरें आने लगी. सैनिकों पर पथराव करते हुए अनेक नागरिक सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए और कई को अपनी आँखों से हाथ धोना पड़ा.इसमें ऐसे मासूम बच्चे और औरतें भी शामिल हैं जो अपने घरों में थे जो किसी भी तरह उपद्रव में शामिल नहीं थे लेकिन अपनी घरों की छतों से या खिड़की  से झाँकते हुए सुरक्षा बलों की फायरिंग की जद में आ गए थे.

पाकिस्तान ने इस घटना को कश्मीरियों पर जुल्म बताते हुए काला दिवस मनाने का ऐलान कर दिया और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की धमकी दी तो भारत के लोगों की सोई हुई देशभक्ति तुरंत जाग गयी जो और किसी मौके पर जागे न जागे ऐसे मौके पर तुरंत जाग जाती है.फेकुलर सेकुलरों को गाली देने लगे कि वो आतंकियों के हिमायती हैं. भक्त फेकुलरा पत्थर के बदले आँख फोड़ देने की यह कहकर हिमायत करने लगे कि जब आँख ही न रहेगी तो सुरक्षा बलों पर निशाना साधकर पत्थर कैसे फेंकेगे ? ये भी कहा गया कि एक पत्थर फेंकने वाले को पाँच सौ रुपये प्रतिदिन आई एस एस से मिलता है .मतलब ये कि ये मनरेगा से भी बड़ा रोजगार कार्यक्रम है. जरूर भारत में आई एस एस भी भारत सरकार से ज्यादा बड़ा होगा.
  हमने सोचा कि कुछ दिन इसकी ही तहकीकात की जाए लेकिन तभी छत्तीसगढ़ में एक कथित नक्सली महिला की कथित मुठभेड़ में मौत की खबर आ गयी. जिसके बारे में कहा ये भी जा रहा है कि एक आदिवासी लड़की का सुरक्षा बलों द्वारा गेंग रेप किया गया है और उसे  मारने  के बाद उसकी मृत देह को नक्सलियों की वर्दी पहनकर फेंक दिया गया है.मृत महिला की देह पर वर्दी नयी और सही सलामत मिलने से इस आरोप को सही समझा सकता  है. इसकी भी जांच हो रही है लेकिन सोशल मीडिया पर इसको लेकर ज्यादा हंगामा नहीं  है, ऐसे मामलों में देशभक्ति नहीं जागती है .अगर जागती है तो ऐसी  घटना को भी सही ठहराने के लिए किन्तु परन्तु अगर मगर होने लगती है .पहले इन्हें चीन से इमदाद बताई जाती थी अब आई एस आई और आई एस एस  बताए जाने लगे हैं . अब तोअब आई एस आई और आई एस एस के भारत सरकार से ज्यादा शक्तिशाली होने के बारे में कोई संदेह होना ही नहीं चाहिए.
 सोचा थोड़ा इस पर ही लिखा जाएगा  लेकिन तभी गुजरात में मृत गऊओं की चमड़ी उतार रहे अनुसूचित   जाति के युवकों की गौ रक्षकों द्वारा चमड़ी उधेड़ देने का वीडियों सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. लेकिन इससे न तो किसी की भावना आहत हुई और न किसी का देश प्रेम जागा. अनुसूचितों  जाति के युवकों की  बेरहमी से पिटाई करने वाले  हिन्दुत्ववादी गिरोहों के गुंडा तत्वों को किसी ने आतंकी भी नहीं कहा, अपराधी तक नहीं कहा गया है. उन्हें अभी भी गौरक्षक ही कहा जा रहा है.
इस संवेदन हीनता के विरुद्ध गुजरात के दलितों का गुस्सा भड़क गया और वे बिना किसी संगठन के अपने  अपमान के  प्रतिकार के लिए सडकों पर उतर आये हैं .उन्होंने गौ वंश के मृत शरीर सरकारी अफसरों की कोठियों के आगे डाल दिए हैं और कहा है कि गाय जिनकी मां है  वही उसका अंतिम संस्कार करें अब वो नहीं करेंगे.
  ये विरोध और विद्रोह अभूतपूर्व है .इसमें समाजिक क्रान्ति  की एक बड़ी किरण नजर आती है .मन करता है इस पर खूब लिखा जाए.यूँ दलित स्वाभिमान को आहत करने वाली एक घटना और हो गयी है .दलितों की बड़ी नेता बहिन मायावती को एक हिंदुत्व मार्का छुटभैया नेता ने ऐसे अपशब्दों का प्रयोग किया है जो सदियों से स्त्री के के लिए एक बड़ी गाली माना जाता है .अब क्यूँकि बहिन मायावती स्त्री हैं और दलितों की बड़ी नेता भी हैं तो उन्हें तुरंत दलितों के अपमान की फ़िक्र हो गयी है और उन्होंने दलितों के बड़े विरोध  प्रदर्शन का ऐलान कर दिया है . ऐसे विरोध प्रदर्शन की जरुरत उन्हें तब महसूस नहीं हुई जब गुजरात के दलित मृत गायों के साथ अपनी सुरक्षा  की लड़ाई बिना नेता के  लड़ रहे हैं .उन्होंने आज तक भी गुजरात जाकर उनकी सुध लेने की जरुरत नहीं समझी है लेकिन वे ये विश्वाश रखती हैं कि दलित उनके सम्मान के लिए सडकों पर आएगा. इसमें कोई शक भी नहीं है कि दलित उनके विशवाश की रक्षा करेंगे लेकिन दलितों की रक्षा कौन करेगा ? कोई करेगा कि न करेगा ? इसका किसी को कुछ पता नहीं है . वैसे भी  ये कोई राष्ट्रभक्ति से जुड़ा मसला तो है नहीं .राष्ट्र को बनाने में दलितों का योगदान ही क्या है ? वे कोई मार्शल कौम तो है नहीं जो फ़ौज में जाकर शहीद होते हों और मरे पशुओं की खाल उतारने को राष्ट्र भक्ति का काम माना नहीं जा सकता है.इसमें कुछ बड़ी दलाली भी तो नहीं है जैसे हथियार खरीदने में या खदान खरीदने बेचने में होती है.हथियार खरीदने  या खदान खरीदने बेचने जैसा काम  राष्ट्रीय कार्य हैं .इन्हें राष्ट्र भक्ति से जोड़ा जा सकता है .लेकिन चमड़ी उतारने का काम ? वो इन्सानों की नहीं मृत पशुओं की ? घोर निंदनीय और अराष्ट्रीय कर्म है.हमें तो इसी बात पे बहुत शर्म है कि दलित इसे कर कैसे लेते हैं ? इस शर्म के कारण ही अपने मुँह पर कपड़ा लपेटकर इनकी नंगी  पीठ पर डंडें बरसाने पड़ते हैं कि इन नामुरादों को भी ये अराष्ट्रीय अधार्मिक कर्म करते हुए कुछ शर्म आ जाए .
सोचा ये तो बड़ा पुण्य कार्य कर रहे हैं क्यों ना इन लाठी डंडें वालों की ही खबर ली जाए. लेकिन ये सारे मसाले  आपस में इतने गडड  मड्ड हो गए की पहचान मुश्किल हो गया कि कौन सा मसला जातिवादी है ,कौन सा आतंकवादी है, कौन सा धार्मिक है, कौन सा साम्प्रदायिक है ?
 मुझे मृत पशुओं की खाल उतारने वाले पर्यावरण  के रक्षक, जीव सरंक्षक और परम देशभक्त दिखाई देने लगे हैं, गौ भक्षक आतंकी, गैर धार्मिक और नरभक्षी की औलाद नजर आ रहे हैं तथा छत्तीस गढ़ की मृत युवती भारत माँ की अभागिन बेटी और कश्मीर में सुरक्षा बलों की गोली से अंधें हो चुके मासूम माँ भारती के ऐसे  भाग्यहीन बेटे नजर आते हैं जिनका भविष्य अंधकारमय है.
 सुरक्षा बलों की तरफ नजर उठाकर देखने की मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही है क्यूँकि ऐसा करने पर  मुझे अपनी आँख छिन जाने का भय  है .बस राहत की बात ये है कि उसकी तरफ कोर्ट टेडी निगाह से देख रहा है .मणिपुर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए पंद्रह सौ लोगों की मौत की जांच के कोर्ट ने आदेश सरकार को  दिए हैं .भारत में व्यवस्था कितनी भी खराब क्यों न हो कभी कभी कोर्ट से राहत मिल जाती है. तो क्या इस पर लिखा जाए ?
 भक्त फ़ौज पर सवाल उठाने के लिए किसी कलमकार को तो देशद्रोही कह सकते हैं लेकिन कोर्ट को तो देशद्रोही नहीं कह सकेंगे. लेकिन ऐसे सवाल करने पर कोर्ट कलमकार की सुरक्षा को भी तो नहीं आएगा. सुरक्षा तो सुरक्षा करने वाले ही करेंगे.अब अगर वो नहीं करेंगे तो कोर्ट क्या कर लेगा ? ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब कोर्ट के आदेश के बावजूद कुछ नहीं हुआ है. आम आदमी वैसे ही बहुत असुरक्षित है ऐसे में जान   बूझकर आफत कौन मौल ले .तो क्या कुछ ना लिखा जाए ? चुप रहा जाए ? लेकिन चुप भी तो नहीं रहा  जाता है .कलमकार का लिखने से रुक जाने का मतलब बिना मौत मर जाना है ?
तो फिर मेरे मित्रों आप ही बताएं क्या लिखा जाए? कैसे लिखा जाए ?लिखने को बहुत कुछ है साहिर के ही शब्दों में कहूँ तो -
 
                                 कहता है मेरा खामा, किस किसको मैं बाँधू ?
                                  बादल से चले आते हैं मज़मूं मेरे आगे .

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