सोमवार, 18 जुलाई 2016


पहले वो तय करेंगे किसे मारना उन्हें
फिर नाम भी धरेंगे जो पुकारना हमें .
आतंकवादी होगा या होगा वो नक्सली
ये भी नहीं तो फिर दलित जिसकी कुछ न चली.



सीमा पर हम लड़ने जायें ना ना ना 
अपना भी कुछ खून बहायें ना ना ना 
एक नहीं, दो नहीं, आठ दस को वो मारें 
शीश काट कर हम दस लायें ना ना ना .



इस सच कौन सुने देखे, जाने क्यों इस सच्चाई को 
किसने नफ़रत में बदल दिया उन के दिल की अच्छाई को ?
क्या बंगाली, क्या पंजाबी, क्या मणिपुरी,क्या कश्मीरी 
क्यों देख रहे भाई सारे, शक की नज़रों से भाई को ?



जब पत्थर आतंकवादी हो, गोली राष्ट्रभक्त हो जाये,
मधुर गीत गाने वाले की बोली बहुत सख्त हो जाये.
ऐसा वक्त देखने से अच्छा अन्धा बहरा हो जाना, 
मेरे मौला मुल्क में मेरे, ऐसा वक्त कभी ना आये .


साथी रोहित जिन्दा है अब इंक्लाब के नारों में 
ऊंची  बंधी हुई मुट्ठी में, हर दिल के अंगारों में . 


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