बुधवार, 20 जुलाई 2016

पानीदार मौसम में एक पानीदार ग़ज़ल
**********************************************
मौन रहा ,पर जब-जब भी अवसर पता है
सूना घाट नदी से खुलकर बतियाता है

कलकल की इस मीठी स्वर-लहरी में अक्सर
बहते-बहते पानी गीत-ग़ज़ल जाता है
पानी से पानी की मुठभेड़ें भी होतीं
फिर पानी ही पानी को खुद समझाता है
खूब बड़प्पन देखा है हमने पानी का
पानी हरदम ऊपर से नीचे आता है
कैसे हैं वो लोग यहाँ जिनकी आँखों का
सारा का सारा पानी ही मर जाता है
----------------महेश अग्रवाल भोपाल

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें