सोमवार, 1 अगस्त 2016

आजादी है जिम्मेदारी


     'आजादी है जिम्मेदारी'

आजादी है जिम्मेदारी इसमें सबकी हिस्सेदारी
इसको सबने लडकर पाया खैरात नहीं ये सरकारी .
हम और लडेंगे जीतेगें संघर्ष नहीं अब कम होगा
जब तक आजादी में अपना हिस्सा ना सबके सम होगा.

ये देश अगर आजाद हुआ तो नहीं तुम्हारी ही खातिर
हमने भी शीश चढ़ाये हैं काटे हमने दुश्मन के सिर .
फिर क्यों आजादी अब तक भी अपने द्वारे तक ना आई ?
क्यूँ भूख हमारे घर बैठी अब तक बनकर बूढ़ी माई ?

क्यूँ नहीं अभी तक एक किरण, रौशन कर सकी अँधेरे को
किसने सूरज को कैद किया, रोके है कौन सवेरे को .
उसकी पहचान करेगें हम, उससे छीनेंगे हक़ अपना
हम सुर्ख सवेरा लायेंगे, साकार करेंगे हर सपना .

हम रूखे सूखे गालों में, खुशियों की लाली भर देंगे
भूखों को भात परोसेंगे हर खाली थाली भर  देंगे .
हंस हंस किलकारी मारेगा तुतलाता,बलखाता बचपन
नित सपने नये सजायेगा इठलाता, मुस्काता यौवन.

बूढी माई आशीषों की सौगात लुटायेगी खुलकर
अपने प्यारे बेटों से वो हर बात बतायेगी खुलकर .
ना भूख कहीं, ना खौफ कहीं, ना बेकारी, ना बीमारी
रस्ता ना किसी का रोकेगी, ना बन पायेगी लाचारी.

सबके सपने पूरें होंगे खुशहाल जिन्दगी जीने के
जो भी जीवन में अमृत सम, वो अमृत छक कर पीने के.
इस एक सपन के लिये ही तो हम इन्कलाब लाने निकले
जो हमसे छीन लिये हैं वो, सब सुर्ख ख्वाब लाने निकले .

हम सुर्ख सवेरा लाते हैं,  आजादी का आजादी का
हम नग्मा नया सुनाते हैं, आजादी का आजादी का .
आओ सब साथ हमारे तुम, ये काम सभी के करने का
ये वक्त साथ मिल लडने का,ये वक्त साथ मिल चलने का.

हम साथ लडेंगें जब मिलकर,दुश्मन ना जबर टिक पायेगा
आयेगा इन्कलाब एक दिन, रोके से नहीं रूक पायेगा .
ये सौदागर, ये साहूकार,छुटभैये, सत्ता के दलाल
बच्चू बचने ना पायेंगे, गरदन कर देंगे हम हलाल .

जिसके दम पर ये उछल कूद,जिसके दम पर करते शोषण
उससे हम लडकर जीतेंगे, हम छेड चुके हैं भीषण रण .
जेंलें, रेलें, चौराहें सब, अपने कब्जे में कर लेंगे
खुद पर तानी जाने वाली, बन्दूकें पहले धर लेंगें .

हर हाथ उठेगा इन्कलाब, आवाज उठेगी इंकलाब
धरती से अम्बर तक गूँजेगा,इन्कलाब औ इन्कलाब ।

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें