बुधवार, 21 सितंबर 2016


लिखने को फ़साने हैं
कुछ लफ्ज़ पुराने हैं
हाँ तुमको सुनाने हैं
जो ख्वाब सिरहाने हैं
आओ कभी तो ठहरो
एक रात की ही खातिर
कुछ तुम भी कहो अपनी
कुछ हम भी कहें अपनी
तरीक सी रातों में
सिर्फ इश्क नहीं होता
कुछ बातें भी होती हैं
शिकवे भी तो होते हैं
माना के गिले तुमको सोने नहीं देते हैं
जलवाते हैं शहरों को रोने नहीं देते हैं
कुछ ज़ख्म हमारे भी अब तक यूं तड़पते हैं
चाएं भी जो हम मिलना, ये होने नहींदेते हैं
हाँ ज़ख्म था वो गहरा जब खींची थी एक सरहद
इस मुल्क के सीने में, मथुरा औ मदीने में
क्या भूल नहीं सकते वो सुबहो अजोध्या की
जब राम ने मारा था, रावण को नहीं, खुद को
जब चलती हुई लाशें, एक रेल के डिब्बे में
जलती हुई मज़हब पे कुर्बान हुईं एक दिन
उन जलती हुई लाशों की इतनी चिता भड़की
गुजरात की सड़कों पर बन-बन के धरम लहकी
क्या भूल नहीं सकते उन बम के धमाकों को
इस्लाम बचाने को बम्बई में जो करवाए
क्यूँ दफन नहीं करते वहशत के उन नारों को
कैराना शामली के खेतों आज जाके
एक बार करो इतना, फिर देखेंगे हम दोनों
क्या रातें मुसलसल ही इतनी ही बड़ी होंगी?
क्या यूं ही अकेले ही फिर भी लिखेंगे नज्में
या महफ़िलों की मस्ती रातों से बड़ी होगी
आओ कभीतो ठहरो
एक रात की ही खातिर
कुछ तुम भी कहो अपनी
कुछ हम भी कहें अपनी
लिखने को फ़साने हैं
कुछ लफ्ज़ पुराने हैं
हाँ तुमको सुनाने हैं
जो ख्वाब सिरहाने हैं

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