बुधवार, 7 दिसंबर 2016

हम फ़कीर हैं उठा के झोला जब चाहेगें चल देंगे 
रोज बदलते हैं हम चोला फिर से नया बदल लेंगे 
कभी सनक उठती है हमको कभी पिनक में आ जाते 
ज्यादा तंग हमें मत करना वरना तुम्हें मसल देंगे .

मत भूलो हम चित्रकूट में झोली टाँगे आये थे  
भोली भाली सीता को हम धर्म मर्म समझाये थे 
एक फकीर चोले में भी छुपा फरेबी हो सकता 
ये दुनिया ने तब जाना जब सीता को हर लाये थे .

यही कहानी इंद्र कर्ण की यही है विष्णु और बलि की 
हर फ़कीर के चोले में छुप जाती चालें सभी छली की 
भारत की जनता भावुक है धर्म भीरु और भोली भाली 
फ़ौरन लट्टू हो जाती है जब बातें की चलाचली की .

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