रविवार, 7 मई 2017

दोहे और शेर

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,
जो खाने को ना मिले हम क्यूँ कहें हजूर ?


बहुत सीधे रहे होते तो अब तक कट गए होते,
कहीं शहतीर बन जाते,या फिर बल्ली या फिर तख्ते .

कुल्हाड़े नापते कद, आरियाँ छाती पे चढ़ जाती 
मेरे टुकड़े बिका करते कहीं महंगें कहीं सस्ते .



परदे पर बाहुबली देख, जनता बैठी खुश होती है 
सरहद पर मरता सैनिक है,बेवा परदे में रोती है.


जो एक शीश के बदले में दस शीश काटने वाले थे 
अब उन का नेकर गीला है,अब उनकी पीली धोती है .


0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें