रविवार, 23 जुलाई 2017


कभी दोस्त जोड़ते हैं, कभी हम घटा रहे हैं 
अभी दिल जवां है अपना खुल के बता रहे हैं |
उनका है हाल ऐसा, मिलते कभी नहीं हैं 
ठहरो अभी आते हैं ,ये कहते जा रहे हैं |

      फेसबुक पर अपनी अपनी पसंद के अनुसार अच्छा लिखने वालों की फेहरिस्त देने का चलन है | मैंने भी कई बार अपने पसंदीदा लेखकों की फेहरिस्त बनायी है लेकिन कुछ सोच कर पोस्ट नहीं की है | असल में उन लिखने वालों में कई लोग बड़े अहंकारी दिखते हैं | एक अच्छा लेखक होना और सहज, सरल होना एक बात नहीं है | एक ख़ास बात ये भी देखी गयी है कि मैं जिन्हें नियमित रूप से पढ़ता हूँ उनमें से यदा कदा ही कोई मेरी पोस्ट पर अपनी उपस्थिति दर्शाता है और जो मुझे पढ़ते हैं उन तक मेरी पहुँच अनियमित है | फिर भी औपचारिकता के लिए किसी के लिखे को सराहते रहना मुझसे नहीं होता है | वाह जैसा छोटा शब्द भी मैं तभी लिखता हूँ जब वो बरबस मेरे होटों तक आ जाता है | यूँ कुछ लोगों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार मुझे भी रहता है| वो नहीं आते तो थोड़ी मायूसी होती है |

         कुछ लोग पोस्ट करने के बाद अपनी पोस्ट की ओर पलटकर भी नहीं देखते हैं | जो अपनी पोस्ट नहीं पढ़ते हैं वो किसी और की पोस्ट क्या पढ़ते होंगे ? फेसबुक क्या शौचालय है ,निवृत हुए और चल दिए ? कम से कम अपनी पोस्ट पर आनेवाली प्रतिक्रिया का संज्ञान लेना ही चाहिए वरना यूँ लिखते चले जाने का क्या मतलब है ? अगर आप को अपना लिखा पढ़ने की ही फुर्सत नहीं है तो यकीन मानिए दूसरा कोई भी आपका लिखा नहीं पढ़ेगा |दुसरे आप से ज्यादा व्यस्त हैं क्यूंकि वो लिखते भी हैं और पढ़ते भी हैं तथा अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं | आप उन्हें निठल्ला समझते हैं तो ये आपकी बेहूदगी है | एक लिखने वाले से एक गभीरता से पढ़ने वाला ज्यादा आदरणीय है |

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