शनिवार, 2 सितंबर 2017

         कुछ लोग बकरों की कुर्बानी को लेकर क्षुब्ध हैं लेकिन रोहिंगा मुसलमानों के कत्लेआम पर चुप्पी साधे हैं कुछ लोग रोहिंगा मुसलमानों के कत्लेआम पर गमजदा है लेकिन जानवरों को जिबह करने में कोई दर्द महसूस नहीं करते हैं | इंसान की जान की बराबरी जानवर की जान से अगर ना भी की जाए तब भी जिन्दा रहने का हक़ तो बेजुबान जानवर को भी है | क्रूरता किसी ख़ास मौके पर जायज नहीं हो सकती है | बुद्ध को मानने वाले, इस्लाम को जानने वाले जाने किस तर्क से अपनी हिंसा को सही सिद्ध करते हैं हमारी समझ में में तो ऐसा कोई तर्क नहीं आता है | अगर ये धर्म है तो फिर धर्म को अफीम कहने वाले ने बहुत हलके शब्दों में इसकी निंदा की है | ऐसा कोई भी धर्म जो हिंसा को बढ़ावा देता है अधर्म है |


           म्यांमार से जान बचाने के लिए भारत में घुस आये रोहिंगा मुसलमानों को को भारत खदेड़ रहा है जबकि भारत हमेशा से बेसहाराओं की शरण स्थली रहा है | भारत ने चीन से सताए गए तिब्बतियों को शरण दी है |पाकिस्तान से सताए गए बंगालियों को शरण दी है |पुराने समय में मुस्लिम आक्रान्ताओं से सताए गए पारसियों को शरण दी है |वे सब लोग अपनी पूरी धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के साथ भारत में गुजर बसर कर रहे हैं लेकिन रोहिंगा मुसलमान जिन्हें मुस्लिम देशों से भी मदद नहीं मिल रही है भारत से खदेड़े जा रहे हैं | सिर्फ इसलिए खदेड़े जा रहे हैं क्यूंकि वे मुसलमान हैं | लगता है भारत अब अपनी मानवतावादी परम्परा और सहिष्णुता का परित्याग कर रहा है | ये कोई शुभ परिवर्तन नहीं है | अगर बुद्ध और गांधी का देश मानवता की रक्षा का अलमबरदार नहीं होगा तो कौन होगा ?

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