शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

कलमकार की ह्त्या पर खामोश रहे जो 
नहीं एक भी शब्द शोक का लिख सकते हैं |
अच्छा हो वो कलम छोड़ बस ताली पीटें
यूँ भी अच्छे भक्त बने वो रह सकते हैं |



अगर तू कलम का सिपाही है तो उठा कलम वो दे नाम लिख
तेरे हमसफ़र को जो राह में, सरेआम क़त्ल है कर गया |
तू सहम गया क्यूँ है खौफ से,जो मरा जरा भी ना वो डरा ?
जो रहा ना अपने उसूल पे वो तो जाने कब का है मर गया |


जब तक हम पहचान लिए हैं हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख.ईसाई,
तब तक हम कैसे हो सकते हैं आपस में भाई भाई ?
जिस दिन ये पहचान मिटाकर हम केवल इंसान बनेगें,
उस दिन नहीं करा पायेगा हम लोगों में कोई लड़ाई |

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