बुधवार, 8 नवंबर 2017

ये धुँआ कहाँ से उठ रहा है ?

      ये जो धुंध है जिसमें आँख खोलने पर आँख में मिर्चे सी लगती है ,आँख से पानी आता है और सांस लेने पर दम फूलता है ,सांस घुटती है ये उसी विकास का परिणाम है जिसकी ओर हम अंधें होकर  दौड़ रहे हैं | किसानों द्वारा खेतों में धान की पराली जलाने को इसका बड़ा कारण बताया जा रहा है,वह सही हो सकता है लेकिन वह एकमात्र कारण नहीं है | मेरी समझ से सडकों पर दौड़ रहे चार पहिया वाहन जिसमें ज्यादातर कारें हैं इसके लिए जिम्मेदार हैं | बेतरतीब तरीकें से फ़ैल रहे शहर और औद्योगिक क्षेत्र भी इस भयंकर प्रदूषण के बड़े कारक  हैं | एन सी आर में हरियाली का क्षेत्र दिन पर दिन सिकुड़ रहा है और वाहनों से निकलने वाला धुंआ बढ़ रहा है |कोर्ट ने भी किसानों के पुराली जलाने पर रोक की बात तो कही है लेकिन बाकी तरीके से जो धुंआ फ़ैल रहा है उस पर रोक के लिए कुछ नहीं कहा है |
 इसी प्रकार कई शहरों में ई रिक्शा पर कई तरह की पाबंदी लगा दी हैं |उनका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है | उनके रूट सीमित कर दिए हैं और उनकी संख्या भी सीमित कर दी गयी है |मतलब कि सारी समस्या किसानों और मजदूरों के कारण है बड़ी बड़ी कारों वालों के कारण प्रदूषण या जाम की कोई समस्या नहीं है | होना ये चाहिए था कि तमाम मानव चालित रिक्शे वालों को सरकार अपनी तरफ से ई रिक्शे देती ताकि मानव द्वारा मानव को ढोने की अमानवीय कुप्रथा पर रोक लगती तथा प्रदूषण से भी निजात मिलती लेकिन सरकार ने ठीक इसका उल्टा किया है |ई रिक्शों पर रोक लगाई है और कारों और डीजल ईधन से चलने वाले दूसरे वाहनों को छूट दी है | क्या सरकार को डीजल पेट्रोल से चलने वाले वाहनों पर रोक लगाकर बैटरी चालित वाहनों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए था ?
इसी प्रकार किसानों पर पराली जलाने से रोक लगाने के स्थान पर उनसे पराली लेकर उसके दूसरे उपयोग पर काम करना चाहिए तथा इस दौरान डीजल पेट्रोल से चलने वाले निजी वाहनों की संख्या को सीमित कर देना चाहिए | एक ऐसी व्यवस्था भी बनायी जा सकती है जिसमें कोई भी कार वाला एक या दो सवारी लेकर ना चलने पाए| वो अपने साथियों के साथ गाडी शेयर करे या ट्रेफिक पुलिस द्वारा बिठाई गयी सवारी को अपने गंतव्य तक लेकर जाए | निजी गाडी आपकी निजी सुविधा के लिए है लेकिन आप उसके द्वारा जो प्रदूषण फैला रहे हैं उसका खामियाजा बिना गाडी वाले क्यों भुगतें ? आज जो लोग एन सी आर में स्मोग से पीड़ित हैं वे सब उस स्मोग के लिए जिम्मेदार नहीं हैं |ज्यादातर लोगों का इसमें कोई योगदान नहीं है लेकिन तकलीफ में वही लोग ज्यादा हैं |इस प्रदूषित आबो हवा के कारण एक फुटपाथ पर सोने वाला इंसान जो जीवन की तमाम सुविधाओं से वंचित है वो बिना किसी कसूर के दमा और कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहा है |जिसके जिम्मेदार वो तमाम अमीर लोग हैं जो दिन रात उसके मुंह पर अपनी गाड़ियों का धुंआ छोड़ते हुए इधर से उधर भागते रहते हैं | ये सारे लोग मानवता के अपराधी हैं और इनके द्वारा किया गया विकास मनुष्य के विनाश का कारण बनता जा रहा है |हमें विकास की इस अवधारणा को जो सिर के बल खड़ी है उसे उलट कर सीधा करना होगा और विकास की एक ऐसी राह चुननी होगी जो इको फ्रेंडली हो ताकि मनुष्य खुली हवा में मजे से सांस ले सके |जहां हवा में बदबू ना हो एक खुश्बू आये |कभी ताजा खिले फूलों की कभी सौंधी मिट्टी की |

     जब तक धुंध छायी है तब तक तमाम सरकारी और निजी वाहन बंद कर देने चाहियें |कोई सरकारी अफसर हो या मंत्री, कोई सेठ हो या संतरी सबको केवल सार्वजनिक परिवहन सेवा का ही उपयोग करना चाहिए | ऐसा करने से प्रदुषण ही कम नहीं होगा सार्वजनिक सेवाओं की खस्ता हालत का भी देश के कर्णधारों को सही ज्ञान हो जाएगा तब शायद वे इसको बेहतर बनाने की भी सोचें | जिसे निजी वाहन का शौक हो उसे केवल साइकिल चलाने की अनुमति दी जाए या कोई बीमार या अशक्त हो तो उसे बैटरी चालित वाहन उपलब्ध कराया जाए | डीजल पेट्रोल चालित निजी वाहन को चलने की बिलकुल अनुमति नहीं दी जानी चाहिए |सरकारी अफसरों मंत्रियों की गाड़ियां तुरंत जब्त की जानी चाहिए |किसान ही क्यों सारी तकलीफ भुगते ? वो आपके लिए बढ़िया बासमती चावल भी उगाये और धान की पुराली भी ना जलाये ? आप क्या चाहते हैं धान आपको दे दे और स्वयं पुराल में सोये ?सरकार को चाहिए कि वह धान का समर्थन मूल ही घोषित ना करे धान की पुराली खरीदने की भी व्यवस्था करे |जो सरकार दो रुपये किलो चावल बांटती रहती है उसे मालूम होना चाहिए कि ये चावल किसान अपने खून पसीने से पैदा करता है |आज आप किसान को अपराधी घोषित कर रहे हैं |किसान अगर धान पैदा करना बंद कर दे तो आप दो रुपये किलो चावल देकर वोट नहीं बटोर पाओगे |वोट नहीं पाओगे तो मंहगी गाड़ियों में भी नहीं चल सकोगे और ना मन की बात कह सकोगे |इसलिए अपने मन की करने से पहले इस देश के किसानों मजदूरों के मन की सुनो |आप नहीं सुनते हो तो इतिहास गवाह है कि उन्हें बहरों को भी सुनाना आता है और एक दिन वो जरूर बहरों के कान खोल देंगे |

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