गुरुवार, 9 नवंबर 2017

हमने नदियों को मार दिया, हम घोल हवा में रहे जहर
पहले ये ओर किसी पर था, अब टूट पड़ा हम पर ही कहर 
बच्चे बूढ़े बीमार सभी बैठे बैठे ही खांस रहे 
दो कदम दूर भी नहीं चले साँसें फूली हैं हांप रहे 
आँखों में मिर्ची चुभती है,आंसू आ जाते बिना बात 
सूरज जब आँख खोलता है धुंधीयाला हो जाता प्रभात |
सतरंगी सुबहें कहाँ गयीं ? बहुरंगी शाम किधर गुम है
बच्चों की धमा चौकड़ी क्यूँ बंद कमरों में ही गुमसुम है |
ये आतंकी किसने पाला ? किसने परवान चढ़ाया है ?
किसने खुँखार राक्षस को अपना भगवान बताया है ?
वो कोई हो जो भी होगा मानवता का वो दुश्मन है
हँसता मुस्काता दिखता हो पर उसका कलुषित ही मन है |
पहले मन स्वच्छ करो सबका तब स्वच्छ बनेगी आबो हवा|
तन मन से स्वस्थ रहेंगे सब,ना खायेगा तब कोई दवा |

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें