रविवार, 31 दिसंबर 2017

"सफदर हाशमी की याद में"

जनवादी लेखक संघ मेरठ द्वारा दिनांक 31-12-2017  को कमिश्नरी पार्क, मेरठ में  "सफदर हाशमी की याद में" किये गए  कार्यक्रम में  बर्कले विश्विद्यालय यू एस ऐ के प्रोफेसर वेदप्रकाश वटुक ने कहा कि हमारे राजनेता मस्जिद मन्दिर के असली रूप और मर्म को विध्वंश करने पर तुले हुए हैं। इन घृणा के सौदागरों ने लोगों के दिलो दिमाग में जहर भर दिया है|
आज बोलना सरकार की आलोचना करना देशद्रोह माना जाने लगा है,और लोग अपने को सेक्युलर कहने से डरने लगे हैं।उन्होंने अपनी लम्बी कविता के माध्यम से बताया कि ''मैं सेक्युलर हूँ'' में कहा  हर खतरे को उठाकर भी मैं सेक्युलर ही रहूंगा।
इस अवसर पर जनवादी लेखक संघ के जिला सचिव मुनेश त्यागी ने कहा कि सफदर हाशमी ने नुक्कड़ नाटक को सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का माध्यम बनाया और उसे प्रेक्षागृहों से निकाल कर सड़को, गली कूंचों ,गांव मोहल्लों में ले गया।सफदर का विचार था बेहतर विचारधारा,,,,, बेहतर नाटक।
उन्होंने कहा कि सफदर हाशमी ने लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं, पढ़ाई, शिक्षा, रोटी कपड़ा मकान, मंहगाई, न्यूनतम वेतन जैसे मुद्दों पर,,,, मशीन, औरत, राजा का बाजा ,गांव से शहर तक, हत्यारे, समरथ को नही दोष गुंसाई,, हल्लाबोल, और अपहरण भाईचारे का, किताब, पर्दानशीं जैसे नुक्कड़ नाटक और किताबें लिखी।आज भी सफदर के ख्वाब, काम और आदर्श अधूरे हैं, जनता की बेहतरी मंजिल से दूर है।आइये हम सब उनके अधूरे अभियान में शामिल हों।
मुरादनगर से आये संस्कृतकर्मी त्रिलोक चन्द शर्मा ने कहा किकहा कि शोषण और अन्याय के खात्मे तक जनहित में लेखनी नही रुकेगी। मेहनतकशों पर हमले लगातार जारी हैं।आज जमीन, विचार, लेखन, कथन और संविधान सब पर हमले हो रहे हैं, हमारे अधिकारों की जबर्दस्ती छीना जा रहा है आज जनतंत्र, समाजवाद , गणतंत्र, धर्मनिर्पेक्षता ,सब पर आक्रमण जारी हैं।सफदर इन सब हमलों के खिलाफ था।
मुरादनगर से आये नरसिंह नरायण मिश्रा ने कहा कि आज जनवाद को समझने की जरूरत है, सम्राज्यवाद हमारे अधिकारों पर खुले आम हमले कर रहा है, और इन हमलों में हमारी सरकारें शामिल हैं, यह बेहद अफसोस की बात है।सफदर से जुड़कर अच्छा लगता है, वह मजदूरों किसानों का हितैषी था, सफदर के जलाए दीपक को जलाए रखना जरूरी है और काबिलेतारीफ है।यही जिजीविषा सफदर और उसके आदर्श को जिंदा रखेगी।
इस अवसर पर नुक्कड़ कविताओं का पाठ भी किया गया जिसमें ब्रजपालसिंह ब्रज ने कुछ यूँ कहा,,,,,
टोपी, चोटी, पगड़ी दाढ़ी से हम
धर्मों की पहचान नही चाहते,
मंदिर मस्जिद की दहलीजों में बन्दी
अल्लाह भगवान नही चाहते।
अमर नाथ मधुर ने अपनी गिराने, ऊठाने, होश, सवालों, रुलाने और सुलाने की बात कुछ इस तरह रखी,,,
अभी गिरा है मयार अपना, अभी गिराने की बात होगी,
करेंगे हम तामीर कभी फिर, अभीभुलाने की बात होगी।
अभी है लोगों में होश बाकी, अभी सवालों के सिलसिले हैं अभी रुलाने की बात होगी, अभी सुलाने की बात होगी।
डॉ रामगोपाल भारतीय ने आदमियत को बचाने के लिए कुछ कुछ इस तरह से कहा,,,,,
आदमियत को कोई कैसे बचाये,
मारने वालों की तैयारी बहुत है।
मुरादनगर से आये नरायन मिश्रा ने ध्यान और आरती की बात यूँ की,,,,,
मैं अनाम शोषितों के शौर्य का आगाज हूँ,
योग हूँ, मैं ध्यान हूँ, मैं आरती, नमाज हूँ।
त्रिलोक चन्द शर्मा ने इस प्रकार कहा,,,,,,
कुछ अतीत के खंडहर हैं,जो बाधा बन बन जाते हैं,
यदि इनको मान लिया तो, नव निर्माण असम्भव है।
इन अवसर पर सरधना से आये वीरेंद्र अबोध ने अपनी की नुक्कड़ कविताएं पेश की,,,,,
जिंदा तुम्हारा नही महल रहेगा,
खपरैलों से ही खून बहेगा,
रोटी के लिए ही युद्ध ठनेगा,
सुखिया का हसिया ही हथियार बनेगा।
कमिश्नरी पार्क मेरठ में हुई इस गोष्ठी की अध्यक्षता वेदप्रकाश वटुक और, संचालन मुनेश त्यागी ने कहा।
,,,,मुनेश त्यागी[
जिला सचिव जनवादी लेखक संघ मेरठ]
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