गुरुवार, 10 मई 2018

ये मौसम भी शरारत पर उतर आया है, क्या होगा ?
मेरा दिल भी बगावत पर उतर आया है, क्या होगा ?
हवा कुछ तेज चलती है, उसे चलने दो तुम संभलो
तुम्हारा तन हरारत पर उतर आया तो क्या होगा ?



अब तक सत्ता थी, ताकत थी, जलवा था
खाते रोज मलाई, मिलता हलवा था |
जब आ गया इलैक्शन देख के घबराये 
वोटर के  हाथों में लम्बा खलवा था |


हमने दिल से लिखा और सहेजा है, 
लेकिन पढने वाले पढकर छोड़ गये । 
ऐसा पहले प्यार में होता देखा है 
जिससे प्यार किया दिल तोड़ गये।


जो सिर्फ दुपट्टा संभालने की दे नसीहत 
ऐसे हरेक मर्द की गर्दन को उड़ा दो |
औरत कभी मर्दों से कही कम नहीं होती 
दीवार पे लिखी ये इबारत को पढ़ा दो |

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