सोमवार, 14 मई 2018



'हम जो नीम तारीक राहों में मारे गए ' ----- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेरे होठों के फूलों की चाहत में हम ,
दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए ।
तेरे हाथों की शमअ की हसरत में हम,
नीम तारीक राहों में मारे गए ।

सूलियों पर हमारे लबों से परे
तेरे होठों की लाली लपकती रही ।
तेरी ज़ुल्फों की मस्ती बरसती रही
तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही ।

जब खुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम
हम चले आए, लाए जहाँ तक क़दम |
अपमा ग़म था गवाही तेरे हुस्न की
देख क़ायम रहे इस गवाही पर हम ।

ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी
तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी
किस को शिकवा है गर शौक के सिलसिले
हिज्र की क़त्लगाहों से सब जा मिले

क़त्लगाहों से चुनकर हमारे अलम
और निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफिले
जिनकी राह-ए-तलब से हमारे क़दम
मुख़्तसर कर चले दर्द के फासिले

कर चले जिनकी ख़ातिर जहाँगीर हम
जाँ गवाँकर तेरी दिलबरी का भरम
हम जो तारीक राहों में मारे गए .. ।

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