गुरुवार, 21 जून 2018

भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई  पटेल ने साढ़े पांच सौ रियासतों में बिखरे भारत को एक करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है |इसके लिए उन्हें हैदराबाद और जूनागढ़  की रियासत में सेना का इस्तेमाल करते हुए बल प्रयोग भी करना पड़ा | सारा देश उन्हें इसीलिए लौह पुरुष कहकर श्रद्धा से याद करता है |
मध्यकाल में सम्राट अकबर ने भी भारत को एक करने का काम किया था |इसके लिए जहाँ उन्होंने तत्कालीन  राजाओं से मैत्री सम्बन्ध  बनाये वही उनसे रोटी बेटी का रिश्ता भी जोड़ा| लेकिन अकबर को उस समय के कुछ छोटे बड़े रजवाड़ों के विरुद्ध  फौजी ताकत का भी इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें मेवाड़ का राज्य प्रमुख था | अकबर ने मेवाड़ के महाराणा प्रताप को अपने दरबार में पांच हजारी का ओहदा देकर सम्मान देना चाहा लेकिन महाराणा प्रताप अपनी रियासत को स्वतंत्र रखने के लिए अड़ गए | तब अकबर ने उन पर फौजी चढ़ाई कर दी | दोनों तरफ की सेनाओं में राजपूत और पठान सैनिक शामिल थे |आमने सामने की लड़ाई में महाराण प्रताप हार गए और भागकर जंगल में जा छुपे तथा फिर वहीँ से बरसों तक छापामार युद्ध लड़ते रहे | अकबर और महाराणा प्रताप दोनों की मृत्यु के पश्चात ये संघर्ष ख़त्म हो गया | राणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के बेटे जहाँगीर को मुल्क का बादशाह स्वीकार किया और जहाँगीर ने अमर सिंह को पांच हजारी की बजाये दस हजारी का ओहदा दिया | इसका मतलब था कि वे अपनी अधीन दस हजार सिपाहियों की फ़ौज रख सकते थे  जो जरूरत  पड़ने पर दिल्ली के लिए लड़ेगी | मेवाड़ की स्वतंत्रता का सिर्फ इतना मोल रहा कि राणा को पांच हजारी की जगह दस हजारी का ओहदा मिल गया और उसे दिल्ली के दरबार में हाजिरी  से भी छूट मिल गयी |
 उस समय देश की वैसी अवधारणा नहीं थी जैसी आज है | किसी रियासत के आजाद होने का मतलब भी वहाँ के शासक का मनमाना तरीके से शासन करना भर था | जनता को इससे कोई मतलब न था की दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठता है और चित्तोड़  की गद्दी पर कौन बैठता है | आम जनता को अपने खाने पीने जीने से मतलब था,शासक से नहीं |
आज भी जनता को इससे क्या फर्क पड़ता है कि केंद्र में कौन पी एम् है और राज्य में कौन मुख्य मंत्री है | जनता को फर्क तब पड़ता है जब उसकी रोजमर्रा की चीजें उसकी पहुँच से बाहर हो जाती हैं या वो शान्ति और सम्मान से अपनी जान माल की हिफाजत नहीं कर पाता है | राष्ट्र की एकता और स्वतंत्रता इसी मायने में महत्वपूर्ण है कि वो आम आदमी के जीवन में क्या सहूलियतें पैदा करती है या क्या दुश्वारियां खड़ी करती है | उसमें सांप्रदायिक रंग भरना खाने के मशालों में रंग भरने जैसा है जो सेहत के लिए हानिकारक ही है उससे  किसी तरह का कोई फायदा नहीं पहुंचाता है |ये अलग बात है कि तात्कालिक रूप से रंग चौखा आ जाता है लेकिन वो रंग भी स्थायी नहीं होता है |
 राष्ट्रीय एकता के गीत गाने वाले जब राष्ट्रीय एकता को कायम करने में अपना ऐतिहासिक योगदान करने वाले महान लोगों को साम्प्रदायिक चश्में से देखते हैं तो वे उनकी सोच को  स्वीकार करने का  मन नहीं करता है भले ही वे अपने राष्ट्रवाद का कितना भी ढोल पीटें लेकिन उनकी आवाज बेसुरी और बेतुकी ही होती है |आज भारत में ऐसी आवाजें शौर कर रही हैं | इस शौर से स्वयं को बचाये रखना भी देशभक्ति है |आओ हम सब देशभक्त बनें |
  

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