शुक्रवार, 29 जून 2018

कबीर पर दोहे

खड़ा खड़ा है सोचता, झोला लिए फकीर।                               
कांशी से मगहर गये, अन्तिम वक्त कबीर ।


हिन्दू तो हिन्दू कहें,मुस्लिम मुसलमान |
मरने तक भी नहीं गया, चेलों का अज्ञान ||


क्या हिन्दू क्या मुसलमां, मिटटी मृत शरीर |
दफनाओ या फूँक दो, फर्क ना पड़े कबीर ||


कबीरा बसता ज्ञान में, बसता नहीं है देह |
वाणी,कर्म सुधार ले, अखिंयन में रख नेह ||


लम्बी लम्बी फेंकता, कुछ थोड़ी कर शर्म |
दुनिया भर में डोलता, बैठ करे न कर्म  ||



जनता ने बहुमत दिया मिली यही बख्शीश |
लाने थे दस काट सिर, कटा दिए सौ शीश ||


या खुदा मुल्के सियासत कितनी ओछी हो गई,                   
हिदू मुस्लिम अब यहाँ पगड़ी औ टोपी हो गई।

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