बुधवार, 25 जुलाई 2018

बैल हमारा खुद ताऊ बन जाता है

तन्हाई में रहने से  डर  लगता है
लेकिन भीड़ में जाने से घबराता हूँ।
क्या जाने कब भीड़ ये पागल हो जाये,
इसीलिये मैं जाने से कतराता हूँ।


भीड़ इकट्ठी हो जाये मस्जिद टूटे,
भीड़ इकट्ठी हो पत्थर से सिर फूटे।
भीड़ में जाकर अपने गुम हो जाते हैं,
पता नहीं कब कहाँ साथ किसका छूटे।

भीड़ में छुप हत्यारे ने बापू मारे,
भीड़ का क्या इतिहास है ये बतलाता हूँ |



भीड़ बढे तो फिर विवेक खो जाता है
नहीं पता रहता फिर क्या हो जाता है |
भड़काऊ सा नारा एक लगाता है
और भीड़ की गूँज में गुम हो जाता है |

खून खराबा नारों की पैदाईस है
नारे कितने थोथे हैं समझाता हूँ |

जय जवान और जय किसान का नारा है
दोनों हैं बेहाल , कौन आँसू पोंछे ?
गौ रक्षक नरभक्षी बनकर घूम रहे
किसकी हिम्मत है उनको रोके टोके ?

बैल हमारा खुद ताऊ बन जाता है
मैं जब गाय को अपनी माँ बतलाता हूँ |





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