गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

शिक्षा पद्धति के उलझे सवाल-2- 'भाषा'


                                                 



                                                                                                                         'भाषा'

   लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति से असन्तुष्ट लोग जब भी परिवर्तन की बात करते हैं तो बडे तैश में आ जाते हैं। उनका कहना है कि मैकाले और मार्क्स के मानस पुत्रों ने शिक्षा का बेडा गर्क कर दिया। उनका कहना है कि जब ग गणेश के स्थान पर  ग गधा पढायेंगें तो बौद्धिक विकास क्या खाक होगा? जैसा बुद्धिमान ग गधा है वैसे ही बुद्धिमान मैकाले और मार्क्स के मानस पुत्र  शिक्षा सस्थानों में घुसे ये धर्मनिरापेक्ष वामपंथी हैं जब तक इनका सफाया नहीं होगा शिक्षा में कोई बडा परिवर्तन नहीं हो सकता।

                 शिक्षा के प्रति ऐसा सोचने वाले लोगों ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठयक्रमों में मनमाफिक बदलाव किये। उच्च शिक्षा में जहॉं इतिहास में उलटफेर किया, वहीं ज्योतिष और कर्मकाण्ड विषयों में डिग्री स्तर के पाठयक्रम शुरू  किये गये। तर्क दिया गया कि इससे भारतीय धर्म ओर संस्कृति की रक्षा होगी और रोजगार के अवसर बढेंगें| प्राथमिक कक्षाओं के स्तर पर भी बदलाव किये गये। प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा के  प्रमुख विषय हैं भाषा,गणित और इतिहास। आईये हम देखें कि इस  स्तर पर क्या-क्या बदलाव करने की कौशिश की गई और क्या बदलाव करने आवश्यक हैं।

                       
           धार्मिक और अर्द्धधार्मिक शिक्षा संस्थानों द्वारा बाल्यावस्था से ही बच्चों  को धर्मभीरू, देशभक्त और अपनी सॉंस्कृतिक परम्पराओं का पोषक बनाने की कौशिश  की जाती है। भाषा का ज्ञान कराते समय ही वर्णमाला का अध्ययन ऐसे प्रतीक चित्रों और कथा कहानियों के द्वारा कराया जाता है जो धार्मिक और सॉंस्कृतिक रीति रिवाजों से गहरे जुडे होते हैं। क से कलम या कबूतर के स्थान पर कमल,ग से गधा के स्थान पर गणेश स से सरस्वती, र से रथ क से कमडंल भ से भवानी य से यमराज आदि पढाये जाने लगे जिनका उद्देश्य यही था कि बच्चों को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ धर्म और संस्कृति का ज्ञान भी चित्रों और प्रतीको के माध्यम से करा दिया जाये।

                 कुछ लोगों ने इसे रूढिवादिता का प्रसार माना और स्वयं को आधुनिक मानते हुये अ से अभिताभ और ए से ऐश्वर्य राय पढाना शुरू कर दिया। नई दिल्ली के एक प्रमुख प्रकाशक की पुस्तक अक्षर परिचय प्री प्राईमरी स्कूलों में पढायी जा रही है जिसमें बच्चों को वर्णमाला का ज्ञान कराने का यही तरीका अपनाया गया है। उनका कहना है कि आज के बच्चे अ से अनार चाहे ना जानते हों लेकिन अ से अभिताभ तथा  श से शाहरूख आसानी से सीख सकते हैं इसलिये हम वहीं बता रहे है जिसे जानकर बच्चे सीख जायें।

                                         
 यही नहीं इस प्रकाशक ने ष से षटकोण के साथ षडयंत्र और ड से डर जैसा भी पढाना सही समझा। उन्होंने यह समझने जानने की कौशिश नहीं की कि बच्चे षडयंत्र को कैसे जानेंगें समझेंगें।

               असल में शिशु शिक्षा को जितना आसान विषय समझा जाता है वह उतना आसान नहीं है । बडी उमर के बडी कक्षा के बच्चे को आप कितनी ही तरह से समझा सकते हैं और अपनी बुद्धि और अनुभव बाल्यावस्था से अधिक होने के कारण वह समझ भी लेता है लेकिन एक छोटी उमर के बच्चे को आप आसानी से अपनी बात नहीं समझा सकते। अगर हम भाषा ज्ञान की ही बात करें तो बालक को अक्षर ज्ञान कराते समय हमें कई बातों  का ध्यान रखना चाहिये। सर्वप्रथम तो हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हम जिस अक्षर का बोध करा रहे हैं उसके लिये जो शब्द चुना है वो सरल हो और उसका उच्चारण सिखाये जा रहे अक्षर के अनुरूप हो। दूसरे  शब्द उस वस्तु को  चित्रित करता हो जिसे बालक अपने आस पास देखकर पहचान ले या जिसकी ओर इंगित  करके सहज परिचय दिया जा सके।
                 
                 ये दोनो शर्तें अगर पूरी हो जाती हैं तो बालक को अक्षर ज्ञान कराने में आसानी होगी और वह शुद्ध उच्चारण भी सीख जायेगा। लेकिन यही काम सबसे कठिन है। जब हम बच्चे को पढाते हैं य से यमराज तो भैंसे पर सवार गदा लिये सिर पर सीग वाले एक विकरालमुखी काले आदमी का चित्र होता है जो बच्चे को कहीं देखने को नहीं मिलता। उस यमराज के सम्बन्ध में डरावने किस्से कहानी  सुनाकर एक भय बचपन में ही उसके मन में बैठा दिया जाता है जो सारी उमर उसके अवचेतन मन में बसा रहता है। जब भी कोई काले रंग का बलिष्ठ दीर्घकाय पुरूष उसे दिखायी देता है  तो अनायास ही उसे यमराज का ध्यान आ जाता है और उसके मन का  भाव बदल जाता है।

                     
            इसके अलावा यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि जिन चीजों से गॉंव के बच्चे सहज परिचित होते हैं उनसे शहर के बच्चे नहीं हो सकते या जिनसे शहर के बच्चे परिचित होते हैं उनसे गॉंव के बच्चे मुश्किल से ही परिचित होते हैं।उदाहरण के लिये जब हम ई से ईंख पढाते हैं तो पश्चिमी यूपी के ग्रामीण इलाके का बच्चा तो तुरन्त समझ जायेगा कि यह पौधा गन्ने की फसल है लेकिन शहर का बच्चा या किसी ऐसे क्षेत्र का बच्चा जहॉं गन्ना न पैदा हो इसे कैसे समझेगा। अत जब हम समान शिक्षा की बात करते हैं तो उसका मतलब सब जगह एक सी पाठ्य पुस्तकें  नहीं होना चाहिये। जैसा  जिस भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुकूल हो उसे राष्ट्रीयता और विश्व बन्धुतासे जोडते हुये पाठय पुस्तको में शामिल करना चाहिये।
                                 
                   आईये सिर्फ दूसरों के दोष गिनाने के  स्थान पर  हम एक बेहतर बाल पोथी तैयार करें जो हमारी सोच के अनुरूप् बच्चों को अक्षर ज्ञान करा सके । यद्यपि मैं न तो कोई शिक्षाविद हूँ  और न ही व्याकरणाचार्य। फिर भी मैंने  बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने के लिये वर्णमाला का एक प्रारूप तैयार करने का प्रयास किया। इसमें मुझे अनेक व्यवहारिक कठिनाईयों का सामना करना पडा। हिन्दी भाषा  में अनेक वर्ण हैं जिनके लिये कोई ऐसा सहज, सरल शब्द आज भी नहीं है जिसका चित्र सामने रखकर हम बच्चों को वर्णमाला का ज्ञान करा सकें| जब तक ऐसा कोई शब्द चित्र हमारे संज्ञान  में नहीं आता जो बच्चों का सहज परिचित हो और चयनित वर्ण का भी सही ज्ञान कराता हो तब तक अभी तक  प्रचलित शब्द चित्रों को अपनाये रखना हमारी विवशता है। इस सम्बन्ध में आप भी अपनी राय रखिये ताकि नौनिहालों की शिक्षा का कार्य सरल और रुचिकर हो सके |

                                                 
  हिन्दी वर्णमाला
------------------------
अ- अनार, अमरूद।  आ- आम, आग, आदमी,आलू ।  इ- इमली,इस्तरी|  ई- ईख,ईद।  उ- उल्लू, उडान ।

ऊ - ऊन। ए- एडी   ऐ- ऐनक  । ओ- ओला, ओस।  औ- औरत,औजार।  अं- अंगूर|  अः अह:

क- कबूतर,कप, कपड़ा   ख- खरगोश,खरबूजा,  ग- गमला, गधा  घ-घर, घडी,|  डः

च- चम्मच, चरखा  ज- जहाज, जल, जग, जमीन, झ- झरना,झण्डा,

प- पलक,पतंग,पहाड,पक्षी   फ- फल, फर्श   ब- बरगद बस,बकरी,बन्दर,बल्ब,

भ- भवन,भटटी   म-मछली, मकडी,मजदूर|

त- तरबूज,तश्तरी,तराजू,तलवार, थ- थन  द- दवात  ध- धड, धरती,धनुष| न- नल,

ट- टमाटर,टब, ठ- ठप्पा,ठठेरा,ठेला  ड- डमरू,डलिया  ढ- ढक्कन, ण

य- यज्ञ, र- रस्सी,रसोई  ल- लटटू, लडडू, लडकी,   व- वर्षा, वजन, वन,

स्-सरदार,सपेरा, सब्जी

ह- हल,हवन, हथौडा,

क्ष- क्षत्रिय  

त्र-त्रिभुज,त्रिकोण,त्रिशूल,

ज्ञ- ज्ञानी, श्र- श्रमिक।

3 टिप्‍पणियां:

  1. 1-चंदन कुमार मिश्र- पढा। कई बातें मतभेद लायक हैं, कुछ जरूरी भी, कुछ वाकई चिंताजनक।
    8 hours ago · Like

    2-चंदन कुमार मिश्र-मार्क्स के नाम के साथ मैकाले का नाम लेना किसी भी आधार पर सही नहीं बैठता... आपका अंग्रेजी प्रभाव
    जब तब सामने आना लगता है :) माफी चाहता हूँ बुरा लगे तो।
    8 hours ago · Like

    3-विवेक रघुवंशी - commendable
    4-अमरनाथ 'मधुर' नमस्कार, चन्दन भाई मुझे इस मुद्दे पर बातचीत के लिए आपकी बड़ी बेसब्री से प्रतीक्षा थी| असल में आप इतनी सही जगह बोलते हैं किमेरा मन महक जाता है | आपका स्वयं के बारे में जो वक्तव्य है वही मुझे अपना सा लगता है | खैर ये भक्तिभाव मैं स्वयं नापसंद करता हूँ और भगोड़े लोगों का दूर तक पीछा करना मेरा स्वभाव है |
    संदर्भित विषय शिक्षा पद्धति के सवाल पर बात करें | सर्वप्रथम मैं ये बता दूँ कि मैकाले एवं मार्क्स के मानस पुत्रों वाली बात मेरी नहीं है आर०एस0 एस० वालों की है |मेरी न किसी के प्रति अंध भक्ति है और न अंध विरोध है|कुछ विषय मेरे अतिप्रिय हैं उनमें भाषा भी एक है, जिन पर मैं बराबर सोचता रहता हूँ | यहाँ यह भी बता दूँ कि मैं न शिक्षाविद हूँ, भाषाविद ,न पत्रकार, न सरकार, न शिक्षा सस्थान, न कोई नेता या अदालत|इसलिए मेरे लिखने या कुछ कहने सुनने से किसी कि सेहत पर कुछ फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन एक आम आदमी को स्वतंत्रता पूर्वक अपनी बात रखने का जो अवसर इंटरनेट ने दिया है उसका भरपूर उपयोग करते हुए मैं लिखता पढ़ता रहता हूँ |इस दौरान आप जैसे बुद्धिजीवियों से बातचीत हो जाती है, जो मेरे ज्ञान वर्द्धन में बड़ी सहायक है | अंत अपने में मतलब की बात यह है कि आप इस विषय पर लिखने में समर्थ हैं कुछ लिखिए हिन्दी की एक समुचित वर्णमाला तैयार कीजिये |

    जवाब देंहटाएं
  2. सार्थक और सामयिक पोस्ट, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" की १५० वीं पोस्ट पर पधारें और अब तक मेरी काव्य यात्रा पर अपनी राय दें, आभारी होऊंगा .

    जवाब देंहटाएं
  3. 5-लखनऊ के एक निजी विद्यालय में 'आलोक शब्द' नाम की पाठ्य पुस्तक में बच्चों को च से चाकू और ब से बम सिखाया जा रहा है | माध्यमिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने शिकायत मिलाने पर इसके पढ़ाने पर रोक लगाने के आदेश दिये हैं | सवाल ये है की प्राथमिक शिक्षा के प्रति यह लापरवाही का व्यवहार क्यों किया जाता है ? कहा जा रहा है कि च से चाक़ू और ब से बम पढ़ाना बच्चों को हिंसक बनाना है | क्या यह बतायेंगें कि ग से गणेश और त्र से त्रिशूल जो एक जमाने से पढ़ा रहें क्या वो साम्प्रदायिकता और हिंसा की शिक्षा देना नहीं है | मैंने इस विषय पर बहुत सोचा और एक कौशिश की एक सही सोच की अक्षर परिचय का चार्ट तैयार हो सके |

    6-चंदन कुमार मिश्र दुबारा पढ रहे हैं!
    April 29 at 8:36pm · Like

    7-Govind Singh Parmar बहुत सटीक लिखा आपने

    जवाब देंहटाएं