साभार: 'हिन्दुस्तान' समाचार पत्र दिनांक: १४-९-१२
हिंदी और उर्दू का फिजूल विवाद
ले०: जवाहरलाल नेहरू, देश के पहले प्रधानमंत्री
कुछ दिन से फिर हिंदी और उर्दू की बहस उठी है, और लोगों के दिलों में यह शक पैदा होता है कि हिंदी वाले उर्दू को दबा रहे हैं और उर्दू वाले हिंदी को। लेकिन अगर जरा भी विचार किया जाए, तो यह बिल्कुल फिजूल मालूम होता है। साहित्य ऐसे नहीं बढ़ा करते। अक्सर साहित्य का अर्थ हम कुछ दूसरा ही लगाते हैं। हम भाषा की छोटी बातों में बहुत फंसे रहते हैं और बुनियादी बातों को भूल जाते हैं। साहित्य किसके लिए होता है? क्या थोड़े-से ऊपर के पढ़े-लिखे आदमियों के लिए होता है या फिर आम जनता के लिए? जब तक हम इसका जवाब न दें, उस समय तक हमें साहित्य के भविष्य का रास्ता ठीक तौर से नहीं दिखेगा। और अगर हम इस बात का निश्चय कर लें, तब हमारे और झगड़े हिंदी-उर्दू आदि के भी हल हो जाएं। पहली बात जो हमको याद रखनी है, वह यह है कि आजकल का साहित्य बहुत पिछड़ा हुआ है। किसी भी यूरोप की भाषा से मुकाबला किया जाए, तो हम काफी पिछड़े हुए हैं। जो नई किताबें हमारे यहां निकल रही हैं, वे अव्वल दर्जे की नहीं होतीं। और कोई आदमी आजकल की दुनिया को समझना चाहे, तो उसके लिए आवश्यक हो जाता है कि वह विदेशी भाषाओं की किताबें पढ़े।
नई विचारधाराएं अभी तक हमारे साहित्य में कम ही पहुंची हैं। इतिहास, विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति इत्यादि पर हमारी भाषाओं में माकूल पुस्तकें बहुत कम हैं। जो लोग इन बातों के सीखने के प्यासे हैं, उनको मजबूरन और जगह जाना पड़ेगा। बहुत सारे प्रश्न उठते हैं। लेकिन मैं इस समय चंद बातों की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूं।
1. मेरा पूरा विश्वास है कि हिंदी और उर्दू के मुकाबले से दोनों को ही हानि पहुंचती है। वह एक दूसरे के सहयोग से ही बढ़ सकती हैं। और एक के बढ़ने से दूसरे को भी फायदा पहुंचेगा। इसलिए उनका संबंध मुकाबले का नहीं होना चाहिए, चाहे वे कभी अलग-अलग रास्ते पर ही क्यों न चलें। दूसरे की तरक्की से खुशी होनी चाहिए, क्योंकि उसका नतीजा अपनी तरक्की होगा। यूरोप में जब नए साहित्य (अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इटालियन) बढ़े, तब सब साथ बढ़े, एक दूसरे को दबाकर और मुकाबला करके नहीं।
2. इसके माने यह नहीं कि हर एक के प्रेमी अपनी भाषा की उन्नति की कोशिश न करें, लेकिन वह दूसरे की विरोधी कोशिश न हो और मूल सिद्धांत को सामने रखती हो।
3. यह खाली उर्दू-हिंदी के लिए नहीं, बल्कि सब हमारी बड़ी भाषाओं के लिए- बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम- यह बात साफ कर देनी चाहिए कि हम इन सब भाषाओं की तरक्की चाहते हैं और कोई मुकाबला नहीं। हर प्रांत में वहां की भाषा ही प्रथम है। हिंदी या हिन्दुस्तानी राष्ट्रभाषा अवश्य है और होनी चाहिए। लेकिन वह प्रांतीय भाषा के पीछे ही आ सकती है।
4. हिंदी और उर्दू का संबंध बहुत करीब का है और फिर भी कुछ दूर होता जा रहा है। इससे दोनों को हानि होती है। हमें दो बातें समझनी हैं और हालांकि वे दो बातें ऊपरी तौर से कुछ विरोधी मालूम होती हैं, फिर भी उनमें कोई असली विरोध नहीं है। एक तो यह कि हम ऐसी भाषा लिखें और बोलें, जिसमें संस्कृत या अरबी और फारसी के कठिन शब्द कम हों। इसी को आम तौर से हिन्दुस्तानी कहते हैं। कहा जाता है और यह बात सही है कि ऐसी बीच की भाषा लिखने से दोनों तरफ की खराबियां आ जाती हैं। एक दोगली भाषा पैदा होती है, जो किसी को भी पसंद नहीं आती और जिसमें न सौंदर्य होता है, न शक्ति। यह बात सही होते हुए भी बहुत बुनियाद नहीं रखती और मेरा विचार है कि हिंदी और उर्दू के मेल से हम एक बहुत खूबसूरत और बलवान भाषा पैदा करेंगे, जिसमें जवानी की ताकत हो और जो दुनिया की भाषाओं में एक माकूल भाषा हो। हमें याद रखना है कि भाषाएं जबरदस्ती नहीं बनतीं या बढ़तीं। साहित्य फूल की तरह खिलता है और उस पर दबाव डालने से वह मुरझा जाता है। इसलिए अगर हिंदी-उर्दू भी अभी कुछ दिन तक अलग-अलग झुकें, तो हमको उस पर ऐतराज नहीं करना चाहिए।
5. लिपि के बारे में यह विल्कुल निश्चय हो जाना चाहिए कि दोनों लिपियां- देवनागरी और उर्दू- जारी रहें और हर एक को यह अधिकार हासिल हो कि जिसमें चाहे, वह लिखे। अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि एक प्रांत में हिंदी लिपि को दबाते हैं, जैसे सरहदी प्रांत, या दूसरे प्रांत में उर्दू लिपि को मौका नहीं मिलता। हमें एक तरफ की बात नहीं कहनी है, बल्कि यह सिद्धांत रखना है कि हर जगह दोनों ही लिपियों को पूरी आजादी होनी चाहिए।
6. मेरी राय में हर भाषा और हर लिपि को पूरी आजादी होनी चाहिए, अगर उसके बोलने और लिखने वाले काफी हों। मसलन, अगर कलकत्ते में काफी तमिल बोलने वाले रहते हैं, तो उन्हें यह अधिकार होना चाहिए कि उनके स्कूलों में तमिल भाषा में पढ़ाई हो। जाहिर है कि एक प्रांत के राजनीतिक कार्य या अन्य कई काम बहुत सारी भाषाओं में नहीं हो सकते। वह तो प्रांत की ही भाषा में हो सकते हैं। उत्तर भारत और मध्य भारत में जहां हिन्दुस्तानी भाषा जनता की है, वहां एक भाषा और दो लिपियां सब जगह आजादी से चलनी चाहिए। इसके माने यह नहीं है कि हर एक को दो लिपियां सीखनी पड़ेंगी। यह बच्चे पर बहुत बोझा हो जाएगा। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि कुछ लोग दोनों लिपियां सीखें।
7. हिंदी और हिन्दुस्तानी शब्दों पर बहुत बहस हुई है और गलतफहमियां भी फैली हैं। यह एक फिजूल की बहस है। अगर इस बहस को बंद करने के लिए हम बोलने की भाषा को हिन्दुस्तानी कहें और लिपि को हिंदी या उर्दू कहें, तो इससे साफ-साफ मालूम हो जाएगा कि हम क्या कह रहे हैं।
8. यह हिन्दुस्तानी भाषा क्या हो? देहली या लखनऊ के रहने वाले कहते हैं कि हमारी बोली आमफहम है। इसी को हिन्दुस्तानी बनाओ। लेकिन बनारस और पटना और मध्य भारत या राजपूताना में जाइए, तो काफी फर्क मिलता है और अगर शहरों को छोड़कर देहातों में हम जाएं, तो और भी फर्क, फिर कौन भाषा हमारी हो? हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिए, जो सभ्य हो और जिसे अधिक-से-अधिक जनता समझे। इसको हम बैठकर कुछ कोषों या एक-दूसरे से मुकाबला करके नहीं बना सकते, और न दो-चार साहित्यकार मिलकर ही पैदा कर सकते हैं। इसकी बुनियाद तभी मजबूत पड़ेगी, जब लिखने वाले आम जनता के लिए लिखेंगे और बोलने वाले उनके लिए ही बोलेंगे। तब यह दफ्तरी बहसें कि कितनी उर्दू और कितनी हिंदी, ये सब खत्म हो जाएंगी। जनता फैसला करेगी। हमारे लिए सबसे बुनियादी प्रश्न यही है कि हम आम जनता के लिए अपना साहित्य बनाएं और उनको हमेशा अपने दिमागों के सामने रखकर लिखें।
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