मंगलवार, 25 सितंबर 2012

'कौन हूँ मैं ?'--कुमार पंकज



                                                            कौन हूँ मैं ?

प्रश्न ये जग को युगों से सालता है, कौन हूं मैं और मेरी पहचान क्या है?
एक जोड़ी, इन जटिलतम से नयन में, तैरने वाला सरल विज्ञान क्या है?

एक नीला गोदना परिचय का अक्सर।
मैं जगत की बांह पर धरता रहा हूं।
बींधकर मछली की आंखें हर सदी में।
गीत की मैं द्रौपदी वरता रहा हूं।।

एक-सा स्वागत मेरे द्वारे हुआ है, फिर किसी का शाप क्या, वरदान क्या है?
प्रश्न ये जग को युगों से सालता है, कौन हूं मैं और मेरी पहचान क्या है?

दर्द की इक अनछुई आकाशगंगा,
मेरे अन्तर में निरन्तर घूमती है।
आंसुओं के सौरमण्डल की हथेली।
लेखनी मेरी युगों से चूमती है।।

हां, नहीं जाना किसी भी पार मुझको, फिर कोई कश्ती, कोई जलयान क्या है?
प्रश्न ये जग को युगों से सालता है, कौन हूं मैं और मेरी पहचान क्या है?

एक मुट्ठी जश्न सीने से लगाकर।
आह के मैं अन्धकूपों में रहा हूं।।
इस अंधेरे मोड़, उस अंधी गली में।
मैं कई जनमों, बिना सुलगे दहा हूं।।

जब चयन की ख़्वाहिशें शंकर हुई हों, फिर कोई अमृत, कोई विषपान क्या है?
प्रश्न ये जग को युगों से सालता है, कौन हूं मैं और मेरी पहचान क्या है?

ये मेरा संकल्प है, अंतिम समय तक।
गीत के जलते वनो से ना हिलूंगा।।
वक्त की दुर्गम गुफा में जो रखी हैं।
उन शिलाओं पर तुम्हे लिक्खा मिलूंगा।।

मैं कई सदियों से इस पर हँस रहा हूं, सूर्य का उत्थान क्या, अवसान क्या है?
प्रश्न ये जग को युगों से सालता है, कौन हूं मैं और मेरी पहचान क्या है?


-कुमार पंकज

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